भारत में आरक्षण केवल सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में सीटों के बंटवारे की व्यवस्था नहीं है। यह उस ऐतिहासिक सामाजिक असमानता का संवैधानिक जवाब है, जिसने लंबे समय तक बड़ी आबादी को शिक्षा, सम्मान, सत्ता और अवसरों से दूर रखा। लेकिन आज जब आरक्षण को लेकर एक बार फिर बहस और विरोध के स्वर तेज हैं, तब यह समझना जरूरी है कि इसकी आवश्यकता क्यों महसूस हुई, इसने समाज में क्या बदलाव किए और वर्तमान में इसके सामने कौन-कौन से सवाल खड़े हैं।
आरक्षण की पूरी कहानी को समझे बिना इसके पक्ष या विपक्ष में किसी निष्कर्ष तक पहुंचना मुश्किल है।
आरक्षण की शुरुआत संविधान से पहले
भारत में आरक्षण की अवधारणा संविधान लागू होने के बाद अचानक सामने नहीं आई। इसके बीज औपनिवेशिक दौर और उससे पहले चले सामाजिक सुधार आंदोलनों में भी दिखाई देते हैं। 19वीं और 20वीं सदी में शिक्षा तथा प्रशासन में सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में प्रयास किए गए।
कोल्हापुर के शासक छत्रपति शाहू महाराज ने 1902 में पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था लागू की थी। दक्षिण भारत में गैर-ब्राह्मण आंदोलनों के प्रभाव से भी प्रतिनिधित्व आधारित नीतियों का विकास हुआ।
1932 का पूना पैक्ट इस यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। डॉ. भीमराव आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुए समझौते के बाद अनुसूचित जातियों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर सामान्य हिंदू निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की गई।
स्वतंत्रता के बाद संविधान ने सामाजिक न्याय और समान अवसर को राज्य की जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया।
समानता का अर्थ क्या है?
संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है। लेकिन संविधान निर्माताओं के सामने यह सवाल भी था कि क्या केवल समान व्यवहार से वास्तविक समानता हासिल की जा सकती है?
यदि दो व्यक्तियों में से एक को पीढ़ियों से शिक्षा, संपत्ति और संस्थागत अवसर मिले हों, जबकि दूसरा उन्हीं अवसरों से वंचित रहा हो, तो दोनों को केवल समान अवसर देना क्या पर्याप्त होगा?
इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान किए गए। आगे चलकर सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था विकसित हुई।
डॉ. आंबेडकर के विचारों में राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र से जोड़ना महत्वपूर्ण था। इसी व्यापक सोच में प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय का सवाल भी शामिल था।
आरक्षण का उद्देश्य गरीबी दूर करना भर नहीं
आरक्षण को केवल आर्थिक सहायता की योजना मानना इसके मूल उद्देश्य को सीमित कर देता है। इसका एक प्रमुख उद्देश्य उन समुदायों के प्रतिनिधित्व और अवसरों में मौजूद ऐतिहासिक असमानता को कम करना रहा है, जो लंबे समय तक सामाजिक और संस्थागत रूप से पीछे रहे।
गरीबी आर्थिक समस्या है, जबकि जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्करण की जड़ें सामाजिक संरचना में होती हैं। हालांकि आर्थिक स्थिति भी अवसरों को प्रभावित करती है और इसी कारण आज की बहस में आर्थिक आधार की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।
मंडल आयोग के बाद बदली बहस
1979 में गठित मंडल आयोग ने सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन तथा सरकारी सेवाओं में अन्य पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व का अध्ययन किया। आयोग ने केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की।
1990 में वीपी सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने की घोषणा के बाद देश के कई हिस्सों में तीव्र विरोध प्रदर्शन हुए।
1992 में सर्वोच्च न्यायालय के इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ मामले ने आरक्षण की संवैधानिक सीमाओं और सिद्धांतों को लेकर महत्वपूर्ण दिशा तय की। इसी दौर की न्यायिक बहस में 50 प्रतिशत की सामान्य सीमा, पिछड़ेपन की कसौटियों और क्रीमी लेयर जैसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आए।
मंडल के बाद भारतीय राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल और अधिक प्रमुख हो गया।
क्या आरक्षण ने बदलाव किया?
आरक्षण की आलोचना से पहले इसकी उपलब्धियों को भी देखना जरूरी है। इस व्यवस्था ने ऐतिहासिक रूप से कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों के अनेक लोगों को शिक्षा, सरकारी सेवाओं और सार्वजनिक संस्थानों तक पहुंच बनाने का अवसर दिया।
विश्वविद्यालयों, प्रशासन और अन्य संस्थानों में वंचित समुदायों की उपस्थिति बढ़ी और एक नया मध्यवर्ग भी विकसित हुआ।
लेकिन आरक्षण को सामाजिक न्याय की पूरी समस्या का समाधान मानना भी उचित नहीं होगा।
यदि किसी बच्चे को गुणवत्तापूर्ण स्कूल नहीं मिलता, परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है, डिजिटल संसाधन उपलब्ध नहीं हैं और उच्च शिक्षा तक उसकी पहुंच सीमित है, तो केवल अंतिम चरण में आरक्षण उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं हो सकता।
सामाजिक न्याय की शुरुआत विश्वविद्यालय की सीट से नहीं, प्राथमिक शिक्षा से होनी चाहिए।
आरक्षण के विरोध की वजह क्या है?
आज आरक्षण के विरोध के पीछे कई तरह के तर्क सामने आते हैं।
पहला सवाल सीमित अवसरों का है। सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा की प्रतिष्ठित सीटों की संख्या सीमित है। प्रतियोगिता बढ़ने के साथ आरक्षण को लेकर असंतोष भी सामने आता है।
दूसरा बड़ा मुद्दा मेरिट का है। आरक्षण विरोधी अक्सर सवाल उठाते हैं कि इससे योग्यता का महत्व प्रभावित होता है।
लेकिन यहां यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि मेरिट का निर्माण किन परिस्थितियों में होता है?
एक विद्यार्थी को महंगे निजी स्कूल, कोचिंग, इंटरनेट, शिक्षित परिवार और बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिले, जबकि दूसरे विद्यार्थी को सीमित संसाधनों वाले स्कूल और सामाजिक-आर्थिक बाधाओं का सामना करना पड़े, तो केवल परीक्षा में प्राप्त अंकों को अवसरों की पूरी तस्वीर मानना कितना उचित होगा?
इसलिए बहस को केवल मेरिट बनाम आरक्षण तक सीमित करने के बजाय अवसरों की समानता और मेरिट की परिभाषा पर भी केंद्रित करने की जरूरत है।
आरक्षण की समीक्षा पर भी हो बहस
आरक्षण की आलोचना करने वाले हर तर्क को खारिज कर देना भी समाधान नहीं है। यदि किसी व्यवस्था का लाभ लगातार अपेक्षाकृत सक्षम परिवारों तक सीमित होता रहे और सबसे पिछड़े लोगों तक पर्याप्त रूप से न पहुंचे, तो उसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसी संदर्भ में क्रीमी लेयर की अवधारणा महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों में अपेक्षाकृत सक्षम तबका लगातार आरक्षण का लाभ न लेता रहे।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के भीतर भी लाभों के वितरण तथा सबसे वंचित समूहों तक अवसर पहुंचाने को लेकर बहस होती रही है।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि आरक्षण रहे या खत्म हो।
सवाल यह भी होना चाहिए—
आरक्षण किसे मिले?
कितने समय तक मिले?
किस आधार पर मिले?
और इसका लाभ वास्तव में सबसे वंचित व्यक्ति तक कैसे पहुंचे?
आर्थिक आधार और आरक्षण
आरक्षण की मौजूदा बहस में एक बड़ा सवाल यह है कि क्या सामाजिक और जातिगत पिछड़ेपन के साथ आर्थिक स्थिति को भी प्रमुख आधार माना जाना चाहिए।
2019 में संविधान संशोधन के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। इससे आरक्षण व्यवस्था में आर्थिक मानदंड की भूमिका औपचारिक रूप से बढ़ी।
हालांकि गरीबी और सामाजिक भेदभाव को एक ही समस्या नहीं माना जा सकता। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति गरीबी का सामना कर सकता है, जबकि किसी सामाजिक समूह के खिलाफ ऐतिहासिक भेदभाव की प्रकृति अलग हो सकती है।
इसलिए भविष्य की नीतियों पर विचार करते समय सामाजिक पिछड़ापन, आर्थिक स्थिति, शैक्षणिक अवसर और वास्तविक प्रतिनिधित्व जैसे अलग-अलग पहलुओं को आंकड़ों के आधार पर देखना जरूरी होगा।
क्या आरक्षण अनंतकाल तक चले?
यह सवाल भी लगातार बहस का विषय है।
आरक्षण की समीक्षा का अर्थ जरूरी नहीं कि उसे समाप्त कर दिया जाए। समीक्षा का अर्थ यह भी हो सकता है कि यह देखा जाए कि कौन वास्तव में वंचित है, किस समूह को कितना लाभ मिला, कौन अब भी पीछे है और क्या नीति का लाभ सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुंच रहा है।
साथ ही यह भी देखना होगा कि शिक्षा और रोजगार के नए अवसर कितने पैदा हो रहे हैं।
इन सवालों के जवाब राजनीतिक नारों के बजाय आंकड़ों और सामाजिक अध्ययनों के आधार पर तलाशे जाने चाहिए।
असली समस्या आरक्षण या अवसरों की कमी?
भारत की चुनौती केवल यह नहीं है कि आरक्षण कितने प्रतिशत है। एक बड़ा सवाल यह भी है कि कुल अवसर कितने हैं।
यदि सरकारी नौकरियां सीमित होती जाएं, उच्च शिक्षा महंगी होती जाए, गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा तक पहुंच असमान बनी रहे और युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार न पैदा हों, तो आरक्षण को लेकर संघर्ष बढ़ना स्वाभाविक है।
इसलिए आरक्षण के साथ-साथ शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा में निवेश बढ़ाना भी जरूरी है।
आरक्षण अवसरों के वितरण में मदद कर सकता है, लेकिन अपने आप नए अवसर पैदा नहीं करता। भारत को दोनों की आवश्यकता है—न्यायपूर्ण वितरण और पर्याप्त अवसर।
बहस को टकराव से संवाद की ओर ले जाने की जरूरत
भारत में आरक्षण की यात्रा सामाजिक बहिष्कार से सामाजिक प्रतिनिधित्व की ओर बढ़ने की यात्रा रही है। यह यात्रा अधूरी हो सकती है, लेकिन इसे पूरी तरह विफल भी नहीं कहा जा सकता।
आरक्षण ने अनेक लोगों के लिए शिक्षा और रोजगार के दरवाजे खोले हैं। साथ ही, आज इसके स्वरूप, लाभ के वितरण और भविष्य की दिशा को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
आरक्षण के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को केवल एक ही नजरिए से देखना उचित नहीं होगा। उसी तरह आरक्षण को पूरी तरह समाप्त करने की मांग भी उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की अनदेखी कर सकती है, जिसके कारण यह व्यवस्था अस्तित्व में आई।
लोकतांत्रिक बहस का रास्ता इन दोनों अतियों से अलग हो सकता है।
सवाल यह होना चाहिए कि क्या हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है? क्या हर युवा को पर्याप्त अवसर मिल रहा है? क्या सामाजिक भेदभाव कम हुआ है? क्या आरक्षण का लाभ सबसे वंचित तक पहुंच रहा है? और क्या हम ऐसा समाज बना पा रहे हैं जहां किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि उसके अवसरों की सीमा तय न करे?
जब इन सवालों के जवाब आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर तलाशे जाएंगे, तभी आरक्षण पर बहस राजनीतिक विवाद से आगे बढ़कर सामाजिक न्याय की सार्थक बहस बन सकेगी।
क्योंकि अंततः आरक्षण का उद्देश्य केवल कुछ सीटों को सुरक्षित करना नहीं था। व्यापक उद्देश्य ऐसा समाज बनाना था, जहां किसी व्यक्ति को केवल उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण पीछे न रहना पड़े।
संगीता कुमारी, संपादक, जागृति टाइम्स







