नई दिल्ली, ।पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ रहा है, जिससे भारत की आयातित तेल और गैस पर निर्भरता एक बार फिर उजागर हुई है। इस चुनौती के बीच केंद्र सरकार ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन साधने के लिए कोयला गैसीकरण जैसे विकल्पों पर जोर दे रही है। देश में फिलहाल कोयले पर निर्भरता पूरी तरह खत्म होना संभव नहीं माना जा रहा है। ऐसे में कोयले के बेहतर और वैकल्पिक उपयोग की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। कोयला गैसीकरण तकनीक के जरिए कोयले को ‘सिनगैस’ में बदला जाता है, जिसका उपयोग बिजली उत्पादन, हाइड्रोजन, मेथनॉल और अन्य रसायनों के निर्माण में किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक ऊर्जा आपूर्ति को मजबूत करने के साथ-साथ आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने में मददगार हो सकती है। सिनगैस से तैयार मेथनॉल को अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है, जिसका उपयोग परिवहन क्षेत्र में बढ़ सकता है। वहीं, डाइमिथाइल ईथर को एलपीजी के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करने की संभावना भी जताई जा रही है।
इसके अलावा, कोयला गैसीकरण से हाइड्रोजन उत्पादन भी संभव है, जिसे कार्बन कैप्चर तकनीक के साथ जोड़कर ‘ब्लू हाइड्रोजन’ बनाया जा सकता है। यह स्टील, उर्वरक और अन्य उद्योगों के डीकार्बोनाइजेशन में सहायक हो सकता है। कोयला गैसीकरण परियोजनाओं से बड़े पैमाने पर निवेश और रोजगार सृजन की उम्मीद है। ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे कोयला समृद्ध राज्यों में इस क्षेत्र में दो लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की संभावनाएं जताई गई हैं। सरकार ने 2020-21 में राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन शुरू किया था, जिसका लक्ष्य 2030 तक 10 करोड़ टन कोयले का गैसीकरण करना है। हालांकि अब तक इस दिशा में प्रगति सीमित रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के कोयले में राख की मात्रा अधिक होने के कारण उन्नत तकनीक की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा, ये परियोजनाएं पूंजी-गहन होती हैं और पर्यावरणीय मानकों का पालन भी चुनौतीपूर्ण रहता है। सरकार इस क्षेत्र को कोर इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा देने, नीलामी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और निवेश को आकर्षित करने की दिशा में काम कर रही है। राज्य सरकारों से भी भूमि, स्वीकृति और बुनियादी ढांचे में सहयोग की अपेक्षा की जा रही है।कुल मिलाकर, ऊर्जा संकट के इस दौर में कोयला गैसीकरण भारत के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभर रहा है, जो ऊर्जा सुरक्षा के साथ आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संतुलन साधने में अहम भूमिका निभा सकता है।







