इतिहास और सामाजिक संरचना की नयी पड़ताल है ‘शूद्रों का सच’
पटना। बिहार विधान परिषद सभागार में रविवार को बहुचर्चित लेखक मिथिलेश कुमार सिंह की शोधपरक पुस्तक ‘शूद्रों का सच’ का लोकार्पण किया गया। पुस्तक में शूद्रों के इतिहास, वर्ण एवं जाति व्यवस्था, सामाजिक संरचना तथा प्राचीन भारतीय समाज से जुड़ी प्रचलित धारणाओं की ऐतिहासिक स्रोतों और प्रमाणों के आधार पर पड़ताल की गई है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने की। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष किशोर मकवाना मुख्य अतिथि, बिहार विधान परिषद के उपनेता प्रो. (डॉ.) राजेंद्र प्रसाद गुप्ता एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र कार्यवाह मोहन सिंह अति विशिष्ट अतिथि तथा पूर्व कृषि मंत्री अमरेंद्र प्रताप सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। धर्म जागरण समन्वय, उत्तर पूर्व के क्षेत्र प्रमुख सूबेदार जी ने विषय प्रवेश कराया।
किशोर मकवाना ने कहा कि मिथिलेश जी की पुस्तक ‘शूद्रों का सच’ शूद्रों के इतिहास को समझने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। उन्होंने पुस्तक को शूद्रों के इतिहास को नए दृष्टिकोण से समझने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास बताते हुए कहा कि इतिहास पर विमर्श समाज में संवाद, सम्मान और समरसता को मजबूत करने वाला होना चाहिए।
मोहन सिंह ने कहा कि ‘शूद्रों का सच’ में अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर खुलकर चर्चा होने से लोगों को इतिहास के विभिन्न पक्षों को समझने का अवसर मिलेगा। इतिहास पर विमर्श करते समय प्रमाण, स्रोत और शोध को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने सामाजिक समरसता का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज के सभी वर्गों के इतिहास और योगदान को समझना आवश्यक है तथा ऐतिहासिक विषयों पर संवाद का उद्देश्य समाज में परस्पर सम्मान और समझ को बढ़ाना होना चाहिए।
सभापति अवधेश नारायण सिंह ने कहा कि भारत का इतिहास अत्यंत व्यापक और विविधतापूर्ण है। समाज में लंबे समय से चली आ रही धारणाओं की तथ्यात्मक समीक्षा आवश्यक है। शूद्रों के इतिहास जैसे जटिल और संवेदनशील विषय को पुस्तक के रूप में सामने लाने के पीछे लेखक की जिज्ञासा, अध्ययनशीलता और शोध की प्रवृत्ति दिखाई देती है। लेखक ने इस विषय को केवल वर्तमान सामाजिक संदर्भ में देखने के बजाय उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समझने का प्रयास किया है।
प्रो. राजेंद्र प्रसाद गुप्ता ने कहा कि पुस्तक का केंद्रीय आग्रह यह है कि भारत के सामाजिक इतिहास को किसी एक वैचारिक चश्मे से नहीं, बल्कि मूल ग्रंथों, ऐतिहासिक स्रोतों, सामाजिक प्रक्रियाओं और उपलब्ध साक्ष्यों के समग्र परीक्षण के आधार पर समझा जाना चाहिए। लेखक प्रचलित निष्कर्षों को केवल अस्वीकार नहीं करते, बल्कि उनके आधार, संदर्भ और तर्कों की पड़ताल करते हुए वैकल्पिक ऐतिहासिक व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं जो कि सराहनीय ही नहीं वरन एक गंभीर बौद्धिक हस्तक्षेप है।
सूबेदार जी ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि ‘शूद्रों का सच’ केवल इतिहास की एक पुस्तक नहीं, बल्कि इतिहास को देखने की प्रचलित दृष्टियों के पुनर्परीक्षण का एक गंभीर बौद्धिक प्रयास है। यह कृति उन औपनिवेशिक और वामपंथी इतिहासकारों के पक्षपातपूर्ण दृष्टि से तर्कपूर्ण संवाद करती है, जिन्होंने अपने लेखन के जरीय भारतीय समाज को गलत तरीके से हीं पेश नहीं किया है बल्कि समाज को बांटने का काम किया है।
अमरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि भारतीय इतिहास-लेखन में लंबे समय से चले आ रहे औपनिवेशिक आख्यानों और बाद की वैचारिक व्याख्याओं के बीच यह पुस्तक एक तीसरी संभावना प्रस्तुत करती है- भारतीय समाज को उसके अपने ऐतिहासिक स्रोतों, अंतर्विरोधों, निरंतरताओं और परिवर्तनशीलता के आधार पर समझने की संभावना। इसी कारण ‘शूद्रों का सच’ को केवल शूद्रों के अतीत की खोज के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास-बोध को नए प्रश्नों, नए प्रमाणों और नए विमर्श के लिए खोलने वाली एक महत्त्वपूर्ण कृति के रूप में देखा जा सकता है।
लेखक मिथिलेश कुमार सिंह ने कहा कि मेरी यह पुस्तक एक लंबी और गहन शोध यात्रा का परिणाम है। भारतीय समाज में शूद्रों की स्थिति को लेकर जो प्रचलित कथाएं फैली हैं वे या तो विकृत रही है या एकांगी । मेरा उद्देश्य केवल अतीत की पड़ताल करना नहीं बल्कि यह समझाना है कि इतिहास हमें सामाजिक न्याय और समानता की ओर ले जाने का अवसर देता है बशर्ते उसे किसी एजेंडा से प्रेरित होकर ना लिखा गया हो। भारत का आधिकारिक इतिहास जो पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया जाता है ढेर सारे मौन कराए गए सत्यों का कब्रिस्तान है। “शूद्रों का सच” उन कब्रों से उठती सत्य की एक आवाज है। ज्ञातव्य हो कि इनकी पिछली पुस्तक “अंबेडकर इस्लाम और वामपंथ” बौद्धिक हलकों में काफी चर्चित रही है । देश विदेश के लगभग सभी महत्वपूर्ण संस्थानों और विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों में इस पुस्तक को जगह मिली है।
मुकुंद राव शोध संस्थान के उप निदेशक डॉ आशुतोष कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया और मंच संचालन डॉक्टर रिंकी कुमारी ने किया। कार्यक्रम में भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष संतोष पाठक, महामंत्री नितिन अभिषेक,विनोद सम्राट, इंजीनियर सत्येंद्र सिंह, अजय सिंह,अनिल ओझा, अरुण कुमार सिंहा , राज किशोर सिंह, शशि आनंद, वरुण कुमार, सहित इतिहास , साहित्य एवं सामाजिक अध्ययन से जुड़े अनेक गणमान्य लोगों के उपस्थिति रही। आयोजन मुकुंद राव शोध संस्थान, सबलपुर, सोनपुर, सारण द्वारा किया गया।







