मुंबई: हिन्दी सिनेमा के लोकप्रिय गीतकार अंजान ने करीब तीन दशक लंबे करियर में अपने यादगार गीतों से फिल्म संगीत को समृद्ध किया। उनके रूमानी और भावनात्मक नगमे आज भी संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं। 13 सितंबर 1997 को 67 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ था।
28 अक्टूबर 1930 को बनारस में जन्मे अंजान को बचपन से ही शेरो-शायरी में गहरी रुचि थी। वह स्थानीय कवि सम्मेलनों और मुशायरों में हिस्सा लेते थे। हिन्दी फिल्मों में उर्दू के बढ़ते प्रभाव के दौर में भी उन्होंने अपने गीतों में हिन्दी भाषा को विशेष महत्व दिया।
अंजान ने गीतकार के रूप में वर्ष 1953 में अभिनेता प्रेमनाथ की फिल्म ‘गोलकुंडा का कैदी’ से शुरुआत की। शुरुआती दौर में उन्हें अपेक्षित पहचान नहीं मिली और उन्होंने कई छोटे बजट की फिल्मों के लिए गीत लिखे। वर्ष 1963 में प्रेमचंद के उपन्यास पर आधारित फिल्म ‘गोदान’ के गीत ‘चली आज गोरी पिया की नगरिया’ को सफलता मिली, जिसके बाद उनके करियर को नई दिशा मिली।
इसके बाद अंजान ने ‘बहारे फिर भी आएंगी’, ‘बंधन’, ‘उमंग’, ‘रिवाज’ और ‘हंगामा’ सहित कई फिल्मों के लिए गीत लिखे। उन्होंने भोजपुरी फिल्मों के लिए भी लोकप्रिय गीत रचे। ‘बलम परदेसिया’ का ‘गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा’ गीत आज भी चर्चित है।
अमिताभ बच्चन पर फिल्माए गए अंजान के गीतों ने उन्हें खास पहचान दिलाई। ‘याराना’, ‘खून पसीने’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘डॉन’ जैसी फिल्मों के उनके गीत बेहद लोकप्रिय हुए। ‘खइके पान बनारस वाला’ और ‘ओ साथी रे’ जैसे गीत आज भी सदाबहार माने जाते हैं।
मिथुन चक्रवर्ती की फिल्मों के लिए भी अंजान ने कई हिट गीत लिखे। करीब 200 फिल्मों में गीत लिखने वाले अंजान की विरासत को उनके पुत्र समीर ने भी आगे बढ़ाया और बतौर गीतकार फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाई।








