काठमांडू: नेपाल में विनाशकारी बाढ़ का पानी भले ही कई इलाकों से उतरने लगा है, लेकिन इसकी दहशत लोगों के मन से नहीं निकल रही। बाढ़ से बचे कई बच्चे रात में डरकर उठ जाते हैं और रोते हुए कहते हैं कि फिर बाढ़ आ गई है। वहीं, कई वयस्क लगातार डर, बेचैनी और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर, अपनों से बिछड़े परिवार अब भी लापता परिजनों की तलाश में जुटे हैं।
पिछले एक दशक की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदाओं में शामिल इस बाढ़ ने नेपाल में बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान किया है। 900 से अधिक लोगों की मौत और करीब 4,000 लोगों के अब भी लापता होने के बीच अब आपदा के मानसिक प्रभाव भी सामने आने लगे हैं। घर, रोजगार और अपने प्रियजनों को खोने वाले लोगों पर भविष्य को लेकर अनिश्चितता का गहरा असर पड़ रहा है।
प्रभावित जिलों में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ तैनात
बाढ़ के बाद बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को देखते हुए नेपाल सरकार ने राहत अभियान के साथ मनोसामाजिक सहायता भी तेज कर दी है। अधिकारियों के मुताबिक, सबसे ज्यादा प्रभावित रसुवा और नुवाकोट जिलों में करीब 50 मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और मनोसामाजिक परामर्शदाताओं को तैनात किया गया है।
इसके अलावा बागमती प्रांत में 64 प्रशिक्षित परामर्शदाताओं को जरूरत पड़ने पर तत्काल सहायता देने के लिए तैयार रखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ प्रभावित लोगों को आने वाले लंबे समय तक मानसिक और भावनात्मक सहायता की जरूरत पड़ सकती है।
बच्चों में दिख रहे डरावने सपनों और तनाव के लक्षण
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे प्रभावित इलाकों में मनोवैज्ञानिक प्राथमिक उपचार शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य आपदा के सदमे से जूझ रहे लोगों को शुरुआती भावनात्मक सहारा देना है।
नुवाकोट के बिदुर में काम कर रहे मनोवैज्ञानिक गोपाल बोहरा के मुताबिक, कई बचे हुए लोगों में सदमे और अत्यधिक तनाव के स्पष्ट संकेत देखे जा रहे हैं। राहत केंद्र में रह रहे कुछ बच्चे रात में बार-बार डरकर जाग जाते हैं और उन्हें बाढ़ से जुड़े डरावने सपने आते हैं।
कई वयस्कों में भी लगातार बेचैनी, भय और अचानक तेज आवाज या हलचल होने पर जरूरत से ज्यादा चौंकने जैसी प्रतिक्रियाएं देखी जा रही हैं।
हेल्पलाइन के जरिए भी मिल रही मनोसामाजिक सहायता
नेपाल सरकार ने फोन के जरिए भी मानसिक और मनोसामाजिक सहायता का दायरा बढ़ाया है। 1115 हेल्पलाइन पर सामान्य स्वास्थ्य परामर्श और समन्वय के साथ बुनियादी मनोसामाजिक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। वहीं 1166 के जरिए विशेष मनोसामाजिक सेवा संचालित की जा रही है, जिसे पाटन मानसिक अस्पताल से चलाया जा रहा है।
अधिकारियों के अनुसार, फिलहाल सात परामर्शदाता अलग-अलग शिफ्ट में चौबीसों घंटे सेवा दे रहे हैं। बच्चों के लिए 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन भी उपलब्ध है।
अभी काउंसलिंग से ज्यादा जरूरी है सुरक्षा और परिवारों को मिलाना
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल प्रभावित लोगों की प्राथमिक जरूरत सुरक्षित रहना, भोजन और आश्रय हासिल करना तथा अपने बिछड़े परिजनों को ढूंढना है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य कर्मी परिवारों को फिर से मिलाने, जरूरी दवाओं तक पहुंच बहाल करने और सदमे से जूझ रहे लोगों को तत्काल मनोवैज्ञानिक प्राथमिक सहायता देने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, आपदा का वास्तविक मानसिक प्रभाव आने वाले समय में और स्पष्ट हो सकता है। जब तत्काल संकट खत्म होगा, तब लोगों में तनाव, चिंता और आघात से जुड़ी समस्याएं अधिक सामने आने की आशंका है। ऐसे में नेपाल के सामने बाढ़ से हुई भौतिक तबाही के साथ-साथ उसके गहरे मानसिक प्रभाव से निपटने की भी बड़ी चुनौती होगी।







