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फर्जी अमेरिकी रक्षा परियोजना घोटाले में 700 करोड़ रुपये की निवेश धोखाधड़ी की जांच तेज

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Investigation into Rs 700 crore investment fraud in fake US defence project scam intensifies

तिरुवनंतपुरम: केरल पुलिस ने देश के सबसे बड़े कथित निवेश घोटालों में से एक की जांच कर रही है। जांच में यह सामने आया कि वीपीवीवी टेक्नो कंस्ट्रक्शन ने भारत-अमेरिका के कथित 83,000 करोड़ रुपये के गोपनीय रक्षा विनिर्माण परियोजना का ठेका मिलने का झूठा दावा कर सैकड़ों निवेशकों से करीब 700 करोड़ रुपये जुटाए हैं।
जांचकर्ताओं का आरोप है कि कंपनी ने नकली रक्षा अनुबंध, सरकारी मंज़ूरी के जाली दस्तावेज़ और फ़र्ज़ी अंतर्राष्ट्रीय समझौते दिखाकर निवेशकों को लुभाया। साथ ही उन्हें ज़बरदस्त वित्तीय लाभ, अमेरिकी वीज़ा, ग्रीन कार्ड और अमेरिका में नौकरी का अवसर देने का वादा भी किया।


कंपनी के प्रवर्तकों (प्रमोटरों) के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं। मामले में कई आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है और जांच जारी है। जांच के दौरान एक महत्वपूर्ण साक्ष्य तब सामने आया, जब अमेरिका में भारतीय दूतावास ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन के जवाब में पुष्टि की कि आरोपी जिस तथाकथित “इंडो-यूएस पैसिफिक पीस ट्रीटी” का बार-बार हवाला देकर परियोजना के अस्तित्व का दावा कर रहे थे, ऐसा कोई समझौता या दस्तावेज़ अस्तित्व में ही नहीं है।
दूतावास के जवाब से यह बात स्पष्ट हो गई कि समझौता फर्जी था जिससे जांचकर्ताओं के उन आरोपों को और बल मिला कि निवेश योजना की बुनियाद ही जाली दस्तावेज़ों पर टिकी थी।
पुलिस का अनुमान है कि केरल और कई अन्य राज्यों के 500 से ज़्यादा निवेशकों के साथ धोखाधड़ी हुई है। जांच करने वाले पैसों के लेन-देन का पता लगा रहे हैं, जुड़ी हुई कंपनियों के नेटवर्क की जांच कर रहे हैं और उन कई दस्तावेज़ों की पुष्टि कर रहे हैं जिनका उपयोग कथित रूप से निवेशकों को यह विश्वास दिलाने के लिए किया गया था कि परियोजना को अमेरिकी अधिकारियों से आधिकारिक मंज़ूरी मिली हुई है।

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जांच के अनुसार, आरोपी ने इस परियोजना को अमेरिकी रक्षा विभाग के लिए हथियारों के निर्माण का एक बेहद गोपनीय कार्यक्रम बताया और दावा किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी पाबंदियों के कारण परियोजना की जानकारी नहीं दी जा सकती है। निवेशकों को कथित रूप से भरोसा दिलाया गया कि इस परियोजना को भारतीय और अमेरिकी अधिकारियों का समर्थन हासिल है।
विश्वसनीयता का भ्रम पैदा करने के लिए कंपनी ने कथित तौर पर भव्य प्रचार कार्यक्रम आयोजित किए। इनमें हेलीकॉप्टर से आगमन, सैन्य शैली की वर्दियां, भारत और अमेरिका के राष्ट्रीय ध्वज, आलीशान आयोजन स्थल तथा रक्षा विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के रूप में प्रस्तुत किए गए लोगों के संबोधन शामिल थे। निवेशकों को गोपनीय समझौतों, रक्षा अनुबंधों और आधिकारिक मंजूरियों के नाम पर कई दस्तावेज भी दिखाए गए, जिन्हें अब जांच एजेंसियां फर्जी और मनगढ़ंत होने का संदेह जता रही हैं।


पुलिस का यह भी आरोप है कि यह अभियान एक बहुस्तरीय रेफरल नेटवर्क द्वारा चलाया जा रहा था, जिसमें मौजूदा निवेशकों को नए लोगों को जोड़ने पर कमीशन मिलता था। इस मॉडल के कारण यह योजना कई राज्यों में व्यापार सहयोगियों, दोस्तों और परिवार के सदस्यों के माध्यम से तेज़ी से फैल सकी।
वीपीवीवी के चेयरमैन वेंकिट्टा वेंकिट, कंपनी के संरक्षक और खुद को आध्यात्मिक गुरु बताने वाले जीएस बिजु (जिन्हें लोग डॉक्टर साहब के नाम से जानते हैं) और व्यापार सहभागी प्रदीप कुमार समेत 12 आरोपियों की ज़मानत की सुनवाई के दौरान “इंडो-यूएस पैसिफ़िक पीस ट्रीटी” में कथित धोखाधड़ी का मामला भी जांच के दायरे में आया।
सुनवाई के दौरान आरोपी ने दावा किया कि भारत और अमेरिका के बीच हथियारों के निर्माण से जुड़े एक गुप्त समझौते की गोपनीय जानकारी लीक हो गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने सीआईए और अमेरिकी रक्षा विभाग समेत 23 अमेरिकी एजेंसियों को इस कथित खुलासे की जांच करने का निर्देश दिया था। ये दावे उनके बचाव में अदालत के सामने पेश किए गए।


जांचकर्ताओं ने हालांकि आरोपी की ओर से अदालत में दाखिल किए गए दस्तावेजों में बड़ी विसंगतियों का संकेत दिया। नवंबर 2025 में कोल्लम प्रधान सत्र न्यायालय में दायर अग्रिम ज़मानत याचिका में, बचाव पक्ष ने दावा किया कि वीपीवीवी कथित समझौते में केवल सहभागी बनना चाह रहा था। इसके बाद केरल उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका में उसी आरोपी ने कहा कि समझौता पहले ही हो चुका था।
बाद में भारतीय दूतावास से आरटीआई के जवाब में स्पष्ट रूप से पुष्टि हुई कि भारत और अमेरिका के बीच ऐसी कोई संधि नहीं है, यह उस मुख्य दावे के उलट है जिस पर कथित रूप से यह निवेश योजना बनाई गई थी।


कथित धोखाधड़ी के पीड़ितों ने सीबीआई जांच की मांग करते हुए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है। उनका तर्क है कि इस मामले में अलग-अलग राज्यों के बीच वित्तीय लेन-देन, अंतरराष्ट्रीय रक्षा से जुड़े जाली दस्तावेज़ और केरल से बाहर तक फैला एक संगठित नेटवर्क शामिल है। उन्होंने धन के लेन-देन, रक्षा से जुड़े दस्तावेज़ों में कथित धोखाधड़ी, इस अभियान से जुड़ी कंपनियों के नेटवर्क और इस योजना से जुड़े सभी लोगों की भूमिका की अदालत की निगरानी में जांच की मांग की है।
जांच एजेंसियां धन के लेन-देन की जांच कर रही हैं और पीड़ितों की पहचान कर रही हैं। साथ ही, वे उस मामले के पूरे दायरे का पता लगाने की कोशिश कर रही हैं जिसे अधिकारी देश के सबसे बड़े कथित निवेश घोटालों में से एक मान रहे हैं।