
गया: बिहार में पूर्व विधायक सोम प्रकाश सिंह को बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बिहार विधानसभा सचिवालय ने उनकी सदस्य पेंशन तत्काल प्रभाव से बंद करने का आदेश जारी किया है। साथ ही 15वीं बिहार विधानसभा के सदस्यों की सूची से भी उनका नाम हटाने की कार्रवाई की गई है। विधानसभा सचिवालय के अवर सचिव जय प्रकाश दूबे ने महालेखाकार कार्यालय, पटना को पत्र भेजकर निर्देश दिया है कि सोम प्रकाश सिंह को पूर्व विधायक के रूप में मिलने वाली पेंशन और अन्य सुविधाएं तुरंत प्रभाव से रोकी जाएं। पत्र में कहा गया है कि सिविल अपील संख्या 5652/2014 में सुप्रीम कोर्ट के 28 जनवरी 2026 के फैसले और राज्य सरकार से प्राप्त विधिक राय के अनुसार सोम प्रकाश सिंह को बिहार विधानसभा का वैध सदस्य नहीं माना जा सकता। ऐसे में वे विधायक कार्यकाल से जुड़े किसी भी लाभ के हकदार नहीं हैं।
सोम प्रकाश सिंह वर्ष 2010 में औरंगाबाद जिले के ओबरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए थे। चुनाव से पहले उन्होंने दारोगा पद से इस्तीफा दिया था, लेकिन बाद में आरोप लगा कि विभागीय कार्रवाई लंबित होने के कारण उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ था। तत्कालीन जदयू नेता और चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वी रहे सोम प्रकाश सिंह ने इस मामले को अदालत में चुनौती दी थी। उनका आरोप था कि सोम प्रकाश सिंह सरकारी सेवा में रहते हुए चुनाव लड़े और महत्वपूर्ण तथ्य छिपाकर नामांकन दाखिल किया। पटना हाईकोर्ट ने वर्ष 2010 के चुनाव को रद्द करते हुए सोम प्रकाश सिंह की सदस्यता समाप्त कर दी थी।
इसके खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने भी उनकी सदस्यता बहाल नहीं की और अंततः 28 जनवरी 2026 को अपील खारिज कर दी। प्रमोद सिंह चंद्रवंशी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को “सत्य की जीत” बताया। उन्होंने मांग की कि उन्हें 15वीं बिहार विधानसभा के कार्यकाल का वैधानिक सदस्य घोषित किया जाए और लंबित वेतन-भत्तों का भुगतान किया जाए। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे आगे अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे। इस फैसले के बाद बिहार की राजनीति और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है। जानकार इसे निर्वाचन प्रक्रिया और जनप्रतिनिधियों की वैधानिक पात्रता से जुड़ा बड़ा मामला मान रहे हैं।






