21 अप्रैल 1979: जब ‘जननायक’ Karpoori Thakur की सरकार गिरी, बिहार की राजनीति में आया बड़ा मोड़
पटना। बिहार की राजनीति के इतिहास में 21 अप्रैल की तारीख एक अहम पड़ाव के रूप में दर्ज है। आज ही के दिन वर्ष 1979 में ‘जननायक’ कर्पूरी ठाकुर की सरकार गिर गई थी। मुख्यमंत्री के रूप में यह उनका दूसरा कार्यकाल था, लेकिन वे इस बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। करीब 1 साल 301 दिन तक सत्ता में रहने के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। कर्पूरी ठाकुर को सामाजिक न्याय की राजनीति का प्रमुख चेहरा माना जाता है। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में 26 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐतिहासिक फैसला लिया था। यह निर्णय मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिशों पर आधारित था। उस दौर में यह कदम क्रांतिकारी माना गया, लेकिन इसी ने उनकी सरकार के लिए मुश्किलें भी खड़ी कर दीं। जनता पार्टी के भीतर ही इस फैसले को लेकर विरोध शुरू हो गया। खासकर सवर्ण नेताओं के एक वर्ग ने आरक्षण नीति का कड़ा विरोध किया। उन्हें आशंका थी कि इससे उनकी राजनीतिक पकड़ कमजोर हो जाएगी। धीरे-धीरे पार्टी के अंदर गुटबाजी बढ़ती गई और सरकार पर संकट गहराने लगा। अप्रैल 1979 तक हालात इतने बिगड़ गए कि कर्पूरी ठाकुर को विधानसभा में बहुमत साबित करने की नौबत आ गई। 21 अप्रैल को हुए फ्लोर टेस्ट में वे विश्वास मत हासिल नहीं कर सके और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद राज्य की राजनीति में नया बदलाव आया और दलित नेता Ram Sundar Das को मुख्यमंत्री बनाया गया।यह घटना आज भी बिहार की राजनीति में एक बड़े राजनीतिक उलटफेर के रूप में याद की जाती है, जिसने सामाजिक न्याय की बहस को नई दिशा दी।







