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कांग्रेस का PM पर हमला: ‘नारी शक्ति वंदन’ कानून पर यू-टर्न, बिना जनगणना आरक्षण लागू करने का आरोप

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Congress attacks PM: U-turn on 'Nari Shakti Vandan' law, accuses him of implementing reservation without census

नयी दिल्ली: कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों पर सवाल खड़े किए हैं। संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के मकसद से बनाए जा रहे कानून- नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर यू टर्न लेने का आरोप लगाते हुए पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म- एक्स पर विस्तृत पोस्ट लिखा। उन्होंने कहा, सितंबर 2023 में नए संसद भवन का उद्घाटन नारी वंदन अधिनियम, 2023 के पारित होने के साथ हुआ था। इस अधिनियम ने संविधान में संशोधन कर लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया। इसमें अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण देने की बात थी।

यह आरक्षण परिसीमन और जनगणना अभ्यास पूरा होने के बाद ही लागू होना था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनावों से इसे तत्काल लागू करने की मांग की थी। तब मोदी सरकार ने कहा था कि परिसीमन और जनगणना के बिना यह संभव नहीं है। अब, करीब 30 महीने बाद, सरकार ने अपना मन बदल लिया है और बिना परिसीमन व जनगणना के आरक्षण लागू करना चाहती है। प्रधानमंत्री पर “सामूहिक भटकाव के हथियार” का उपयोग करने का आरोप है। यह कदम विदेशी नीति की विफलताओं और देश के एलपीजी व ऊर्जा संकट से ध्यान भटकाने के लिए उठाया गया है। सरकार नारी वंदन अधिनियम, 2023 में आवश्यक संशोधन पारित करने के लिए अगले पखवाड़े में दो दिवसीय विशेष सत्र बुलाने की योजना बना रही है। इससे सरकार को पूरा राजनीतिक लाभ मिलने की उम्मीद है।

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अप्रैल में विशेष सत्र बुलाना चुनाव आयोग की आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन होगा। यह कदम जाति जनगणना कराने की सरकार की वास्तविक प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठाता है। सरकार ने अप्रैल 2025 में जाति जनगणना की घोषणा की थी। इससे पहले कांग्रेस नेताओं को इस मांग पर “शहरी नक्सली मानसिकता” का आरोप लगाया गया था। यह विरोधाभास सरकार की मंशा पर संदेह पैदा करता है। विपक्षी दलों ने मोदी सरकार को पत्र लिखकर 29 अप्रैल को वर्तमान विधानसभा चुनाव समाप्त होने के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। उनका कहना है कि प्रस्तावित संशोधनों पर चर्चा होनी चाहिए। मोदी सरकार लोकसभा और विधानसभाओं का आकार 50 फीसदी बढ़ाने की भी योजना बना रही है। इस पर भी सावधानीपूर्वक विचार की आवश्यकता है। यह महत्वपूर्ण संवैधानिक बदलाव बिना व्यापक सहमति के नहीं होने चाहिए।