चेन्नई: मद्रास उच्च न्यायालय ने मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ तमिझगा वेत्री कषगम (टीवीके) के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में द्रमुक की एक महिला पार्षद को अग्रिम जमानत देते हुए तमिलनाडु पुलिस और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक आलोचना के जवाब में आपराधिक कानून का इस्तेमाल करना लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।
न्यायमूर्ति एन. रमेश ने पार्षद डी. सुधा की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री का पद इतना कमजोर नहीं है कि किसी राजनीतिक बैठक में एक वार्ड पार्षद की आपत्तिजनक टिप्पणी से उसकी गरिमा प्रभावित हो जाए। उन्होंने कहा कि राज्य यदि ऐसे शब्दों का जवाब गिरफ्तारी के जरिए देता है, तो इससे उसी पद की गरिमा कम होती है, जिसकी रक्षा का वह दावा करता है।
ग्रेटर चेन्नई कॉरपोरेशन की पार्षद और द्रमुक महिला शाखा की पदाधिकारी सुधा के खिलाफ सात अक्टूबर को दिए गए एक भाषण को लेकर प्राथमिकी दर्ज की गई थी। आरोप है कि उन्होंने भाषण के दौरान मुख्यमंत्री के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया था। इस मामले में टीवीके के एक पदाधिकारी ने 12 दिन बाद शिकायत दर्ज कराई थी। सुधा ने अपने हलफनामे में माफी मांगी, जबकि उनके वकील ने दलील दी कि भाषण राजनीतिक था और पुलिस हिरासत में पूछताछ की कोई जरूरत नहीं है।
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए दलील दी कि भाषण से दुश्मनी बढ़ सकती है और सार्वजनिक शांति प्रभावित हो सकती है। हालांकि, अदालत ने कहा कि सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को आलोचना और उपहास का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 19 आक्रामक राजनीतिक भाषणों को भी संरक्षण प्रदान करता है। इसी आधार पर न्यायालय ने जमानत की शर्त के रूप में सुधा को मुख्यमंत्री की आलोचना करने से रोकने से इनकार कर दिया।
अदालत ने पुलिस की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए। एक अर्थशास्त्री कलैयारसन को फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट से किए गए पोस्ट के मामले में घर से अवैध रूप से हिरासत में लिए जाने का जिक्र करते हुए न्यायाधीश ने कहा कि मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से उनकी रिहाई हो गई, लेकिन ऐसी सुविधा हर नागरिक को नहीं मिल सकती।
न्यायालय ने जोर देकर कहा कि पुलिस की संवैधानिक जिम्मेदारी किसी सत्ताधारी दल की नहीं, बल्कि राज्य और उसके नागरिकों की सेवा करना है। सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के सदस्यों के साथ समान व्यवहार करना पुलिस की अनिवार्य जिम्मेदारी है।







