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आधुनिकता की दौड़ में सिमट रही बुंदेलखंड की लोक विरासत, डॉ. पुरवार ने जताई चिंता

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Bundelkhand's folk heritage is shrinking in the race for modernity, Dr. Purwar expressed concern.

जालौन: उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. हरिमोहन पुरवार ने कहा कि आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के प्रभाव से बुंदेलखंड की सदियों पुरानी लोक विरासत तेजी से विलुप्त होती जा रही है। उन्होंने लोगों से अपील की कि घरों में मौजूद पारंपरिक वस्तुओं को कबाड़ समझकर नष्ट करने के बजाय उन्हें सुरक्षित रखें और “घरेलू संग्रहालय” की अवधारणा अपनाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर संरक्षित करें।


डॉ. पुरवार ने गुरुवार को ‘यूनीवार्ता’ से बातचीत में कहा कि किसी भी क्षेत्र की लोक संस्कृति उसकी वास्तविक पहचान होती है। घरेलू उपयोग की पुरानी वस्तुएं, आभूषण, कृषि उपकरण, धार्मिक सामग्री और दैनिक जीवन से जुड़ी वस्तुएं केवल सामान नहीं बल्कि इतिहास, परंपरा और सामाजिक जीवन की जीवंत स्मृतियां हैं। बदलते समय में इनका उपयोग कम हो गया है और अधिकांश वस्तुएं या तो घरों के कोनों में उपेक्षित पड़ी हैं अथवा कबाड़ में बेच दी जाती हैं। यदि इन्हें अभी सुरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां इनके बारे में केवल पुस्तकों में पढ़ सकेंगी।

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उन्होंने कहा कि प्रत्येक परिवार यदि अपने घर में उपलब्ध पुरानी वस्तुओं का छोटा-सा संग्रह तैयार करे तो बच्चों और युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से परिचित कराने के साथ-साथ क्षेत्रीय विरासत को भी संरक्षित किया जा सकता है। डॉ. पुरवार ने बताया कि बुंदेलखंड में कभी लोहे से बने पारंपरिक ताले, जिन्हें स्थानीय बोली में ‘तारो’ या ‘चौखरौ’ कहा जाता था, घरों की सुरक्षा का प्रमुख साधन थे। मजबूत और टिकाऊ इन तालों का नाम तक आज नई पीढ़ी के लिए अपरिचित होता जा रहा है।


उन्होंने कहा कि क्षेत्र की आभूषण परंपरा भी अत्यंत समृद्ध रही है। महिलाओं के पैरों में पहना जाने वाला चांदी का ‘पेजना’ बुंदेलखंड की विशेष पहचान माना जाता था, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार गिलट का पेजना पहनते थे। दतिया के ढरिया परिवार इस शिल्प के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन आधुनिक आभूषणों के चलन के कारण यह परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है।
चित्रकला से जुड़े कलमदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि लोहे से बने इस उपकरण में चित्रकार अपनी तूलिका रखते थे, जिससे रंग और ब्रश सुरक्षित रहते थे। आधुनिक तकनीक के दौर में यह उपयोगी वस्तु भी लगभग विलुप्त हो गई है। उन्होंने कहा कि बिजली आने से पहले ग्रामीण जीवन में लालटेन और पीतल के लैम्प का विशेष महत्व था। शाम के समय लालटेन की चिमनी साफ कर उसमें मिट्टी का तेल भरकर रोशनी की जाती थी। गांवों में यह भी प्रतिस्पर्धा रहती थी कि किसके घर की लालटेन अधिक चमकदार है। अनेक लोगों ने इन्हीं लैम्पों की रोशनी में पढ़ाई कर जीवन में सफलता प्राप्त की, लेकिन एलईडी और विद्युत प्रकाश व्यवस्था ने इनकी जगह ले ली है।


डॉ. पुरवार ने बताया कि गर्मियों में घरों में बनने वाली पारंपरिक सेवइयों के लिए ‘पेंच’ नामक लोहे के उपकरण का उपयोग किया जाता था। इसे खटिया या तख्त पर लगाकर हाथ से सेवइयां बनाई जाती थीं और परिवार के सभी सदस्य इस कार्य में सहयोग करते थे। मशीनों से बनने वाली सेवइयों के कारण यह परंपरा भी लगभग समाप्त हो गई है। धार्मिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि तांबे और पीतल से बनी आचमनी भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग रही है। इसका उपयोग आचमन और चरणामृत वितरण में किया जाता था। कई आचमनियों पर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान ब्रह्मा की सुंदर आकृतियां उकेरी जाती थीं, जो भारतीय धातु शिल्प की उत्कृष्ट कला का उदाहरण हैं। उन्होंने बताया कि बुंदेलखंड की लोक शिल्प परंपरा में ‘ढिकौली’ का विशेष स्थान था। इसे मिट्टी और पुराने कागज से तैयार किया जाता था। पूरी प्रक्रिया स्थानीय संसाधनों पर आधारित और पर्यावरण के अनुकूल होती थी, जो क्षेत्र की पारंपरिक शिल्पकला की समृद्धि को दर्शाती है।


डॉ. पुरवार ने बताया कि स्थानीय बोली में दर्पण को ‘तख्ता’ कहा जाता था। मोटी धातु और मजबूत कांच से बने ये दर्पण घरों की ड्योढ़ी, पौर और आंगन में लगाए जाते थे तथा वर्षों तक सुरक्षित बने रहते थे। उन्होंने कहा कि लोक संस्कृति केवल ऐतिहासिक स्मारकों और मंदिरों तक सीमित नहीं होती, बल्कि दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली साधारण वस्तुएं भी किसी समाज की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। इन्हीं के माध्यम से उस क्षेत्र की जीवनशैली, कला, शिल्प और सामाजिक परंपराओं का अध्ययन किया जाता है।


इतिहासकार ने कहा कि यदि प्रत्येक परिवार अपने घर में सुरक्षित पारंपरिक ताले, आभूषण, लालटेन, लैम्प, कलमदान, आचमनी, ढिकौली, तख्ता और अन्य लोक उपयोगी वस्तुओं को व्यवस्थित ढंग से संजोकर रखे तो वह स्वयं एक छोटे घरेलू संग्रहालय का रूप ले सकता है। इससे नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत समझने का अवसर मिलेगा और लोक धरोहर का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा।

आधुनिकता की दौड़ में सिमट रही बुंदेलखंड की लोक विरासत, डॉ. पुरवार ने जताई चिंता
उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण केवल सरकार या संग्रहालयों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। यदि आज इन अमूल्य धरोहरों को नहीं बचाया गया तो बुंदेलखंड की समृद्ध लोक संस्कृति की अनेक पहचानें हमेशा के लिए इतिहास का हिस्सा बनकर रह जाएंगी। उन्होंने लोगों से अपनी विरासत को पहचानने, उसका सम्मान करने और उसे सुरक्षित रखकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का आह्वान किया।