मुजफ्फरनगर: अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने दहेज हत्या के मामले में मोहम्मद नदीम को फांसी की सजा सुनाते हुए न्यायपालिका पर दबाव और न्यायाधीशों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए। सोमवार, 7 सितंबर को सुनाए गए फैसले में अदालत ने हत्या को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी विरलतम से विरलतम अपराध माना।
मामला जुलाई 2018 का है। अभियोजन के अनुसार नदीम ने अपनी पत्नी शाहजादी पर केरोसिन डालकर आग लगा दी थी। मुकदमे के दौरान मृतका के माता-पिता सहित कुछ गवाह अपने पूर्व बयानों से मुकर गए। हालांकि अदालत ने शाहजादी के मरणासन्न बयान को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना और आरोपी की भूमिका को प्रमाणित बताया।
फैसला सुनाते हुए जज दिवाकर ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आपराधिक मामलों पर कथित दबाव और प्रभाव को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों को बिना किसी भय के कानून के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।
जज ने दावा किया कि कुछ मुकदमों को वापस लिए जाने के बाद उन्हें एक गैंगस्टर की ओर से कथित तौर पर धमकी दी गई थी। उन्होंने कहा कि उन्हें स्थानांतरण या जिले से बाहर भेजे जाने की चेतावनी भी दी गई। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा, “कायर जज कहलाने से बेहतर है कि मैं मर जाऊं।”
रवि कुमार दिवाकर ने कहा कि उनके लिए न्यायिक जिम्मेदारी सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि वह अपने सिद्धांतों के मुताबिक काम कर सके तो सेवा में बने रहेंगे, लेकिन दबाव में काम करना पड़ा तो इस्तीफा देने पर भी विचार कर सकते हैं।
दिवाकर पहले वाराणसी में ज्ञानवापी मामले की सुनवाई को लेकर भी चर्चा में रहे हैं। उनका दावा है कि उस प्रकरण के बाद उन्हें और उनके परिवार को धमकियां मिली थीं। उन्होंने गंभीर आपराधिक मामलों से जुड़े न्यायिक अधिकारियों की हत्याओं का भी उल्लेख करते हुए न्यायाधीशों की सुरक्षा और न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई।








