ब्रासीलिया। ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा ने कड़े चुनावी मुकाबले में दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी फ्लेवियो बोल्सोनारो को हराकर एक बार फिर जीत हासिल की है। हालांकि, बोल्सोनारो ने चुनाव परिणामों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है और चुनाव रद्द कराने की मांग करने की बात कही है।
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, ब्राजील के सुपीरियर इलेक्टोरल कोर्ट ने बताया कि मतगणना पूरी होने के बाद लूला को 51.79 प्रतिशत, जबकि बोल्सोनारो को 48.21 प्रतिशत वोट मिले। दोनों उम्मीदवारों के बीच कांटे की टक्कर के कारण चुनाव परिणाम पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी थीं।
चुनाव प्रक्रिया पर उठाए सवाल
हार के बाद बोल्सोनारो ने मतदान का समय दो घंटे बढ़ाए जाने को लेकर सवाल उठाए और इसे अस्पष्ट बताया। उन्होंने ब्रासीलिया में अपने समर्थकों के बीच चुनाव रद्द कराने की मांग करने की बात कही। हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक, मतदान केंद्रों को देर तक खुला रखने की मांग दोनों प्रमुख उम्मीदवारों की चुनावी टीमों की ओर से की गई थी।
दूसरी ओर, लूला और उनके समर्थकों ने जीत का जश्न मनाया। समर्थकों ने इसे ऐतिहासिक जीत बताते हुए देश की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव करार दिया।
राजनीतिक सफर में बड़ी उपलब्धि
पूर्व मेटलवर्कर लूला ब्राजील की वामपंथी राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं। उन्होंने जनवरी 2003 से दिसंबर 2010 तक दो कार्यकाल राष्ट्रपति के रूप में काम किया था। इसके बाद जनवरी 2023 में उन्होंने फिर से राष्ट्रपति पद संभाला। इस चुनाव में जीत उनके राजनीतिक सफर की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, पहले दौर के मतदान में बोल्सोनारो को बढ़त मिली थी। ऐसे में दूसरे दौर में लूला की जीत को राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
घरेलू और वैश्विक चुनौतियां
लूला के सामने नए कार्यकाल में आर्थिक विकास, सामाजिक असमानता और देश की राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसी चुनौतियां रहेंगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका के साथ संबंध भी महत्वपूर्ण होंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन लैटिन अमेरिका में अमेरिकी प्रभाव मजबूत करने और क्षेत्र में चीन की भूमिका सीमित करने पर जोर देता रहा है।
ब्राजील प्राकृतिक संसाधनों, कृषि, ऊर्जा और दुर्लभ खनिजों के विशाल भंडार के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में अहम स्थान रखता है। चीन के साथ लूला के करीबी संबंधों के चलते उनकी विदेश नीति पर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर रहेगी।







