रांची: झारखंड का कोडरमा कभी दुनिया भर में अपने चमकीले अभ्रक यानी माइका के लिए जाना जाता था। यहां की खदानों से निकलने वाला माइका देश के साथ विदेशी बाजारों तक पहुंचता था। खनन, छंटाई, प्रसंस्करण और कारोबार से हजारों लोगों की आजीविका जुड़ी थी। समय के साथ नीतियों में बदलाव और वन संरक्षण से जुड़ी पाबंदियों के बीच वैध माइका खदानें धीरे-धीरे बंद होती गईं। इसका असर स्थानीय रोजगार और अर्थव्यवस्था पर पड़ा।
1960 से लेकर 1980 के दशक तक कोडरमा में माइका उद्योग रोजगार का प्रमुख माध्यम था। दिबौर घाटी और नीरू पहाड़ी जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में खदानें संचालित होती थीं। कारोबार से जुड़े लोगों के अनुसार, एक समय यहां 10 हजार से अधिक मजदूर माइका खनन से जुड़े थे। बेहतर गुणवत्ता के कारण कोडरमा के माइका की अंतरराष्ट्रीय बाजार में विशेष मांग थी। रूस समेत कई देशों में इसका निर्यात किया जाता था।
खदानों के बंद होने के बाद माइका पर निर्भर परिवारों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया। स्थायी विकल्प नहीं मिलने के कारण बड़ी संख्या में मजदूर दूसरे शहरों और राज्यों की ओर पलायन करने लगे। कुछ क्षेत्रों में आज भी लोग जंगल और खदान इलाकों में बचे माइका के टुकड़े चुनकर अपनी आजीविका चलाते हैं। कम आमदनी के साथ यह काम सुरक्षा के लिहाज से भी जोखिम भरा माना जाता है।
वैध कारोबार कमजोर पड़ने के साथ अवैध उत्खनन और संग्रह की समस्या भी सामने आई। इससे पर्यावरण के साथ मजदूरों की सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं बढ़ीं। स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि माइका व्यापार का केंद्र दूसरे राज्यों की ओर खिसकने से कोडरमा में रोजगार के अवसर और सीमित हुए हैं।
स्थानीय स्तर पर अब ऐसी व्यवस्था की जरूरत महसूस की जा रही है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण के साथ सुरक्षित और वैध माइका कारोबार, मजदूरों की सुरक्षा तथा स्थायी रोजगार के अवसर सुनिश्चित किए जा सकें। कोडरमा की माइका पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए संतुलित नीति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।







