डॉ अशोक कुमार
कानून की किताबों में जिन उपबन्धों को शामिल किया गया है,उसके अपने औचित्य और महत्व हैं लेकिन शासन शीर्ष से जब कतिपय कानूनी प्रावधानों की व्याख्या दलीय या निजी हित में की जाय तो लोक प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं।इन दिनों देश के पटल पर ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनसे ज्ञात होता है कि सरकारी पक्ष द्वारा कानून की रक्षा की जगह उसकी आड़ में दलीय हितों को साधने की कुचेष्टा की जा रही है। सवाल बुनियादी है कि फिर ऐसे शीर्ष से आम लोगों द्वारा कानून के पालन की उम्मीद का क्या अर्थ है।इस स्थिति में संविधान के मूल तत्व और उद्देश्य का आहत होना सहज रूप में देखा जा सकता है।जो नियम आपात या अत्यधिक आवश्यक स्थिति में प्रयोग करने के लिए बने थे लेकिन जब किसी व्यक्ति विशेष को सुविधा देने हेतु कानून का गलत उपयोग किया जाए तो इसे अनाधिकार कृत्य ही कहा जा सकता है।अपवाद में यदि ऐसा कभी किया जाए तो उसे कानून की परिधि में माना जाएगा लेकिन किसी किसी खास व्यक्ति को विशेष सुविधा मुहैया कराने के लिए किया जा रहा दुरुपयोग तो आम नागरिकों को प्राप्त कानूनी सहायता देने से अनदेखी करते हुए,इसे भयंकर भेदभाव ही कहा जायेगा।
आखिर वह कौन सी वैधानिक लाचारी है कि कोई व्यक्ति दोष सिद्ध हो कर जेल की सलाखों के पीछे है लेकिन कानून का विशेष लाभ ऊँचे रसूख एवं खासी राजनैतिक पैठ रखने वाले ऐसे लोगों को देकर सरकार अपने राज्य में क्या संदेश देना चाहती है। पैरोल या फरलो कैदी को जेल से किसी गंभीर स्थिति में अस्थायी रूप से कुछ दिन या हफ्ते के लिए रिहा करने का प्रावधान किया गया है। परिवार में मृत्यु, गंभीर,बीमारी बेटी की शादी, फसल की कटाई, गंभीर रूप से बीमार पत्नी, पिता से मिलना जैसे मानवीय कारणों पर ये नियम लागू होने की चर्चा कानूनी रूप में वर्णित है।कैदी का यह विशेषाधिकार सरकार द्वारा प्रदत्त मौलिक रूप में अधिकार नहीं है। सूत्र बताते हैं कि यह सुविधा हर कैदी को नहीं मिलता क्योंकि कथित रूप से उसकी पैरवी और पहुंच रसूखदार कैदी के स्तर से निम्न होती है। पेरोल पर छुटे कैदी को पुलिस थाने में रोज हाजिरी लगाने का नियम है लेकिन इसका पालन सख्ती से नहीं हो पाता। पैरोल पर बिताया गया समय सजा की अवधि की गणना से मुक्त है,यानी कैदी जितने दिन बाहर रहा,उतने दिन सजा आगे बढ़ जाती है।
रसूखदारों के लिए पिछला दरवाजा सदैव खुला रहने का प्रमाण देखा जाता रहा है जबकि साधारण कैदी को एक दिन की पैरोल के लिए महीनों चप्पल घिसने पड़ते हैं, वहीं राजनेता, बाबा, माफिया 50-50 दिन की पैरोल/फरलो की सुविधा हर साल ले लेते हैं।लोक संज्ञान में देखा जाता है कि कई चर्चित नेता चुनाव प्रचार के लिए ही पैरोल पर बाहर आ जाते हैं।
सवाल यह भी उठते रहे हैं कि तथाकथित कई अपराधी पैरोल पर बाहर आकर अपने गैंग को अपने उद्देश्य पाने का निर्देश देते हैं,अवैध वसूली करते हुए गवाहों को धमकाते भी हैं, फिर वापस जेल चले जाते हैं।एक प्रकार से अधिकांश मामलों में पैरोल उनके लिए पिकनिक या अपराध विस्तार के श्रोत बन जाते हैं। इससे समाज में यह संदेश जाता है कि जिस कैदी के पास सभी तरह की ताकत है,उसके लिए कानून मजाक का विषय बनकर रह गया है। पैरोल और फरलो का उद्देश्य कैदी को सुधारना था, उसे फिर से सामाजिक समरसता देते हुए इंसान बनाना था, पर दुरुपयोग की दारुण स्थिति ने इसे सजा से बचने का हथियार बना दिया है और वह चुनावी राजनीति का प्रभावी केंद्र बन गया है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार कहा है कि पैरोल/फरलो देते समय सख्ती और पारदर्शिता होनी चाहिए लेकिन सरकार की विश्वसनीयता और प्रतिबद्धता कानून से अधिक उनका दलीय हित है।यह सर्वविदित है कि हरियाणा के सिरसा स्थित सच्चा सौदा डेरा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को अपनी दो शिष्याओं से दुष्कर्म के मामले में आजीवन सजा काट रहे को 17वीं बार पेरोल/फरलो पर 21दिनों के लिए जेल से अभी रिहा किया गया है।आंकड़े दर्पण बता रहे हैं कि रहीम अभी तक 458 दिन जेल से बाहर बिता चुका है।फरवरी,2027 में पंजाब में विधान सभा का चुनाव है जिसमें रहीम का अपने मतदाताओं पर ठोस प्रभाव है जिसका उपयोग हरियाणा सरकार रहीम के ऊपर कृपा दृष्टि बिखेर रही है। बलात्कार और हत्या के दुर्दान्त सजायाफ्ता पर सरकार का यह अनुग्रह अदभुत है और कुछ प्रदेशों में कई दृष्टांत ऐसे हैं जिसके श्रोत में जाने पर एक ही कानून के प्रति सरकार की दोरंगी नीति भी दिखती है।1995 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे जगतार सिंह के पेरोल/फरलो के कई आवेदन को सरकार द्वारा निरस्त कर दिया गया।कठोरता और निर्दयता की हद तब हो गई जब जगतार सिंह की माँ जो गंभीर तौर पर बीमार थीं,उनसे मिलने तक की अनुमति नहीं दी गई ।
राम रहीम पर सरकार द्वारा बरसती कृपा के आखिर मायने क्या हैं,देश के गृहमंत्री को भी स्पष्ट करना चाहिए।क्या देश के सभी राज्य सरकार गंभीर अपराधों की सजा काटने वाले अन्य लोगों के प्रति भी समान मानकों के तहत ऐसा ही रुख अपनाती है।एक विचित्र संयोग भी सिद्ध हुआ है और सवाल भी उठते रहे हैं कि राम रहीम के प्रभावी क्षेत्र में जब भी चुनाव होने होते हैं,उसे मतदाताओं को लुभाने के तंत्र के रूप में सरकार उनके सत्कार के रूप में जेल से बाहर करती है।सरकार की एकपक्षीय सोच में कोई फर्क नहीं पड़ता कि राम रहीम को दी जा रही विशिष्ट उदारता बरतने के क्रम में कानून की मनमानी व्याख्या करने के कारण न्याय और समानता की अवधारणा को किस रूप में घायल किया जा रहा है।काश,देश के गृह मंत्री इस घोर अनियमितता हेतु राज्य स्तरीय समीक्षा कर यह आकलन करते कि कानून को ताक पर रखकर पेरोल और फरलो के प्रावधानों का जिस तरह राजनीतिक खेल हो रहा है,उसे प्रतिबंधित करने के क्या उपाय हैं।(लेखक बिहार प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत संयुक्त सचिव तथा बिहार लोक सेवा आयोग एवं बिहार राज्य विश्विद्यालय सेवा आयोग के पूर्व सदस्य रहे हैं।ये उनके निजी विचार हैं।)







