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शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन अपेक्षित

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education system needs transformation
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प्राचीन भारतीय मंदिर मानव जाति की सबसे बड़ी कलात्मक उपलब्धि है, जिसे पूरी दुनिया मानती है। लेकिन, इन मंदिरों के बनाने के पीछे क्या उद्देश्य थे, इसको समझने के लिए पर्याप्त अनुसंधान या शोध नहीं हुए। वर्तमान समय में इस पर कुछ खोजे हुईं हैं, जो अतीत के इस ज्ञान पुंज पर कुछ रोशनी डालती है। प्राचीन और मध्यकालीन भारत में मंदिर केवल पूजा और आराधना के स्थल ही नही होते थे, बल्कि वे शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान और कला के प्रमुख केन्द्र भी हुआ करते थे। इन शिक्षण केन्द्रों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए मंदिर के माध्यम से भोजन और आवास की व्यवस्था भी की जाती थी। हमारे बाल्यकाल के समय में भी विद्यालय खासकर प्राइमरी स्कूल मंदिरों के प्रांगण में ही हुआ करते थे। जहां गुरूजी का पूरा परिवार बच्चों को हर विषय का यथोचित पाठ पढ़ाते थे। इन स्कूलों को ‘विद्या मंदिर’ या केवल ‘मंदिर’ के नाम से ही जाना जाता था।

बच्चे जब घर से स्कूल जाते या लौटते थे और कोई उनसे पूछता कि कहां से आ रहे हो या जा रहे हो तो उनका एक ही जवाब होता ‘मंदिर’ से । ‘मंदिर’ यानी शिक्षा का केन्द्र। एक लंबे समय से हमें यह पढ़ाया गया कि कि अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय बड़े पैमाने पर निरक्षर थे। यह धारण तब बदली जब धर्मपाल जी ने ‘द ब्यिूटीफूल ट्री’ नामक पुस्तक लिखी। जिसमें उन्होंने 1800 के दशक की शुरूआत से ब्रिटिश दस्तावेजों का उपयोग करके दिखाया कि ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत में शिक्षा व्यवस्था काफी सार्वभौमिक एवं सर्वव्यापक थी। वास्तव में उस अवधि में यूरोप की तुलना में भारत अधिक शिक्षित था। प्रत्येक गांव के एक मंदिर में एक गुरूकुल(स्कूल) अवश्य होता था और उसमें सभी समुदायों के बच्चे पढ़ते थे। इसके अलावा समृद्ध मंदिरों में अकादमियां एवं विद्वत्परिषद थी, जहां अधिक उन्नत विषयों को पढ़ाया जाता था। वैदिक महाविद्यालयों के प्रशासन का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है कि शिक्षक बनने के लिए आवश्यक योग्यताएं निर्धारित थी। बेहतर प्रशासन या संभवत: र्भाइ -भतीजावाद न पनपे इसके लिए यह निर्धारित किया गया था कि शिक्षक उसी गांव का मूल निवासी नहीं हो सकता। शिक्षक को व्याकरण और विभिन्न दर्शनों, तर्कशास्त्र और व्युत्पत्ति विज्ञान में निष्णात (प्रवीण) होने के अतिरिक्त कम से कम एक वेद की जानकारी आवश्यक थी।

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उसे गणित-ज्योतिष को भी जानना जरूरी थी। यह एक रोचक पहलू है कि शिक्षक को शुरू में तीन साल की अवधि के लिए नियुक्त किया जाता था और बाद में उसके कार्यों के मूल्यांकन के आधार पर कार्यकाल को बढ़ाया जाता था। पुरातत्वविद आर. नागास्वामी ने भारत में उन्नत शिक्षा के अकाट्य प्रमाण दिए हैं। उन्होंने कांचीपुरम जिले के उत्तिरामपुर में सुन्दरवारा मंदिर की दिवारों पर 10वीं शताब्दी के शिलालेखों को खोजा है, जिस पर स्थानीय स्कूल और कॉलेज के प्रशासन का वर्णन है। यह मंदिर पल्लव शासन में 750 ई. के आसपास बनाया गया था। बाद में 1013 ई. में राजेन्द्र चोल द्वारा और 1520 ई0 में विजयनगर सम्राट कृष्णदेव राय द्वारा पुनर्निमित किया गया था। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के दौरान, विशेष रूप से 1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकाले के हस्तक्षेप के बाद भारत की गुरूकुल की परंपरा धीरे-धीरे बंद होते चली गई। भारत वर्ष में गुरूकुल कैसे खत्म हो गये इसे समझने के लिए इतिहास के पन्ने पलटने होंगे। 1858 में अंग्रेजों ने ‘इंडियन एजुकेशन एक्ट’ बनाया था, जिसका मसौदा लॉर्ड मैकाले ने ही बनाया था।

इसे बनने से पूर्व भारत की शिक्षा व्यवस्था का व्यापक सर्वेक्षण कराया गया था। अंग्रेज अधिकारी जी.डब्लूलूथर और थॉंमस मुनरो ने उत्तर और दक्षिण भारत का अलग अलग सर्वे किया था। लूथर ने लिखा है कि उत्तर भारत की साक्षरता दर 97 प्रतिशत थी, तो मुनरो ने दक्षिण भारत की साक्षरता दर 100 प्रतिशत बताया था। मैकाले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी ‘देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था’ को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह ‘अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली’ को लागू करना होगा। तभी इस देश के लोग शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब वे अंग्रेजों के बने यूनिवर्सिटी से डिग्री लेकर निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे। मैकाले ने इस मुहावरे को चरितार्थ करते हुए जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने से पूर्व उसे पूरी तरह से जोता है, वैसे ही इस पुरानी शिक्षा व्यवस्था को जोत कर हटाना होगा। इसके लिए उसने सबसे पहले गुरूकुलों को जो आर्थिक सहायता मिलती थी उसे बंद कराने के लिए भारत में धार्मिक और दान-पुण्य की संपतियों यानी धमार्दा (एंडोमेंट) के अधीक्षण और नियंत्रण का अधिकार अपने हाथ में ले लिया। 1850 तक भारत में 7 लाख 34 हजार गुरूकुल ह ुआ करते थे तथा उस समय देश में गांव की कुल संख्या भी लगभग 7 लाख 43 हजार के आसपास थी। मतलब हर गांव में औसतन एक गुरूकुल था। जो आज की भाषा में उच्च ज्ञान स्थल हुआ करते थे। उस समय 18 विषय पढ़ाये जाते थे, जिसमें 8 विषय अनिवार्य एवं 10 विषय वैकल्पिक हुआ करते थे। ये गुरूकुल समाज के सहयोग से (अनाज, कपड़ा अन्य समान एवं सेवाओं) लोगों द्वारा चलाये जाते थे, न कि राजा-महाराजा द्वारा। गुरूकुलों में शिक्षा नि:शुल्क दी जाती थी और समाज के सभी वर्गों के छात्र इन गुरूकुलों में सामान्य रूप से पठन-पाठन के लिए जाते थे।

अंग्रेजी शासन के प्रारंभिक दिनों में ईर्साइ मिशनरी और शिक्षा विभाग में काम कर रहे अंग्रेज अफसरों ने यह अफवाह देशभर में फैला दी थी कि अंग्रेजों के आने से पहले शिक्षा पर ब्राह्मणों का एकाधिकार था। जबकि 1825 के आसपास मद्रास प्रेसीडेंसी के अंतर्गत पाठशालाओं में जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या का एक सर्वे हुआ था, जिसमें कुल 175089 छात्रों में 42502 ही ब्राह्मण विद्यार्थी थे अर्थात 24.25 प्रतिशत। ब्राह्मणों के अलावा अन्य स्वर्ण जातियों के विद्यार्थियों की संख्या 19669 यानी 11 प्रतिशत थी। बचे हुए 85400 शुद्र और अन्य पिछड़ी जाति के थे। मुस्लिम विद्यार्थियों की संख्या 7 प्रतिशत के करीब थी। पूरे देश के किसी भी हिस्से के आंकड़ों से लगभग यही निष्कर्ष निकलता है। अर्थात अंग्रेजों के आने से पहले हमारी शिक्षा व्यवस्था सबके लिए खुली थी, मुक्त थी। मैकाले ने भारतीय शिक्षा पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि उस समय भारतीय प्रशासन इस बात पर बहस कर रहा था कि सरकारी निधियों का उपयोग संस्कृत और फारसी पर किया जाए या अंग्रेजी में पश्चिमी शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए। मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा का पुरजोर समर्थन किया। ब्रिटिश सरकार ने इस सिफारिश को स्वीकार कर लिया। धीरे-धीरे भारत में अंग्रेजी उच्च शिक्षा और प्रशासन की भाषा बन गई। शहरों में विज्ञान, कानून, दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र और इतिहास जैसे विषयों की शिक्षा देने वाले नये स्कूल और कॉलेज खुलने लगे। भारतीय वैदिक (शिक्षा) परंपराओं को हीन मानकर खारिज किये जाने लगा।

परिणामस्वरूप संस्कृत के पारंपरिक संस्थान और प्रतिष्ठान धीरे-धीरे बंद होते गए और स्वदेशी शिक्षण प्रणालियों का पतन हो गया। उपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली से मुख्यत: शहरी अभिजीत वर्ग के एक छोटे से हिस्से को ही लाभ हुआ। अंग्रेजी शिक्षा के लिए उन संसाधनों और शहरी विद्यालयों तक पहुंच की आवश्यकता होती थी, जो अधिकांश ग्रामीण भारतीयों के पास नहीं थी। फलत: एक छोटा सा अंग्रेजी शिक्षित वर्ग उभरा जो अक्सर बहुमत वाली आबादी से सामाजिक रूप से अलग-थलग रहता था। फिर भी मैकाले अपनी रणनीति में पूर्णरूप से सफल साबित हुआ । वर्तमान भारत के अधिसंख्य युवाओं पर अंग्रेजी भाषा का सीधा प्रभाव दिखाई देता है। वे हिन्दी के अपेक्षा अंग्रेजी को ज्यादा तवज्जो देते हैं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति को ढकोसला समझते हैं और पाश्चात्य देश की नकल, खान-पान से लेकर भेश-भूषा तक धड़ल्ले से करने में शान समझते हैं। मैकाले तो यही चाहता था। उपनिवेशिक शासक ने न केवल भारत के भू-भाग पर अधिकार किया, बल्कि उन्होंने अपनी नीतियों से हमारे विचारों और मानसिकता पर अपनी ऐसी छाप छोड़ी कि आजादी के बाद देश से जाने के दशको बाद भी हम उनकी भाषा और शिक्षा व्यवस्था को छोड़ नहीं पाये। भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान विकसित मैकाले प्रेरित शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे शिक्षित वर्ग का निर्माण करना था जो उपनिवेशिक प्रशासन की आवश्यकताओं के अनुरूप काम कर सके। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सत्ता बदली, किन्तु शिक्षा व्यवस्था में कोई अपेक्षित मूलभूत परिवर्तन लंबे समय तक नहीं हो सका।

आज जब भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा, कौशल विकास, अनुसंधान और राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था को पुर्नगठित करने के प्रयास हो रहे हैं, तब परिवर्तन के प्रति प्रश्न उठाये जा रहे हैं। बहस एक लोकतांत्रिक परंपरा है, किन्तु चिंता तब उत्पन्न होती है, जब राजनीतिक स्वार्थों के लिए युवाओं और छात्रों की ऊर्जा को भ्रम, भय अथवा उकसावे की दिशा में मोड़ने की साजिश की जाती है। युवा किसी भी राष्ट्र की चेतना होते हैं। उन्हें नारों की भीड़ नहीं, तथ्यों और तर्क की शक्ति बनाना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी करने वाला व्यक्ति तैयार करना नहीं, बल्कि स्वतंत्रत चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टि, सांस्कृतिक आत्मबोध और राष्ट्र भावना से युक्त नागरिक गढ़ना है। अत: शिक्षा में परिवर्तन का मूल्यांकन विरोध या समर्थन के शोर से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से होना चाहिए । भारत का युवा भावनाओं से नहीं, विवेक से अपना भविष्य चुने- यही लोकतंत्र और राष्ट्र, दोनों के हित में है।

लेखक : सुरेश रूंगटा