A unique tradition in Mahoba, sisters tie Rakhi a day after Rakshabandhan; the festival is linked to an 844-year-old heroic saga.

महोबा: देश के अधिकांश हिस्सों में रक्षाबंधन सावन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, लेकिन बुंदेलखंड की ऐतिहासिक नगरी महोबा में यह पर्व अपनी अनूठी परंपरा के चलते एक दिन बाद मनाया जाता है। यहां रक्षाबंधन के साथ कजली विसर्जन भी अगले दिन होता है। यह परंपरा करीब 844 वर्ष पुराने उस ऐतिहासिक प्रसंग से जुड़ी है, जब महोबा की धरती पर चंदेलों और चौहान सेना के बीच निर्णायक युद्ध हुआ था। बुंदेलखंड की लोक संस्कृति में कजली का विशेष स्थान है। यहां कजली केवल लोकपर्व नहीं, बल्कि महोबा की आन-बान और वीरता की पहचान भी मानी जाती है। इसके पीछे जुड़ी ऐतिहासिक गाथा आज भी लोगों को वीर आल्हा-ऊदल के शौर्य की याद दिलाती है। जगनिक शोध संस्थान के महासचिव एवं सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. वीरेंद्र निर्झर के अनुसार, महाकाव्य ‘आल्हा’ में वर्णित यह घटना वर्ष 1182 की है। उस समय चंदेल साम्राज्य की समृद्धि और वैभव से प्रभावित दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण किया था। चौहान सेना ने नगर को चारों ओर से घेरकर चंदेल नरेश परमर्दिदेव (परमाल) के सामने कई शर्तें रखीं। इनमें चंदेलों की प्रतिष्ठा से जुड़ी पारस पथरी, नौलखा हार, बेंदुला घोड़ा और राजकुमारी चंद्रावल का डोला सौंपने जैसी मांगें प्रमुख थीं। संकट रक्षाबंधन के दिन आया था। उस समय आल्हा और ऊदल अपने मामा माहिल के षड्यंत्र के चलते राज्य से निष्कासित होकर कन्नौज में रह रहे थे।


महोबा पर आई विपत्ति की सूचना महारानी मल्हना ने एक सेवक के माध्यम से दोनों वीरों तक पहुंचाई। मातृभूमि पर संकट की खबर मिलते ही आल्हा-ऊदल पुराने मतभेद भुलाकर अपने सहयोगियों के साथ महोबा लौट आए। बताया जाता है कि दोनों ने योगी का वेश धारण कर युद्ध में प्रवेश किया और चौहान सेना के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया। युद्ध इतना भीषण हुआ कि चौहान सेना को पीछे हटना पड़ा और पृथ्वीराज चौहान का पुत्र करिया भी युद्ध में मारा गया। सावन पूर्णिमा का पूरा दिन युद्ध में बीत जाने के कारण उस दिन न तो कजली का विसर्जन हो सका और न ही बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकीं। अगले दिन महोबा में विजय उत्सव मनाया गया। इसी अवसर पर बहनों ने भाइयों की कलाई पर राखी बांधी और कजली का कीरत सागर में विसर्जन किया गया। माना जाता है कि तभी से महोबा और आसपास के विस्तृत क्षेत्र में रक्षाबंधन तथा कजली मनाने की यह अनूठी परंपरा चली आ रही है। यही वजह है की इस बार पूरे देश मे रक्षा बंधन 28 अगस्त को होगा तो बुंदेलखंड मे यह 29 अगस्त को मनाया जायेगा।

GNSU Admission Open 2026


वीरभूमि राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्रवक्ता डॉ. एल.सी. अनुरागी के मुताबिक, आज भी महोबा में इस परंपरा का पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निर्वहन होता है। कजली पर्व पर भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है और कीरत सागर के तटबंध पर सात दिवसीय मेले का आयोजन होता है। कजली मेले में बुंदेलखंड ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इस तरह महोबा की कजली केवल धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि यहां की सदियों पुरानी वीरगाथा, लोकविश्वास और ऐतिहासिक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने वाला पर्व बन चुकी है।