अगरतला: त्रिपुरा हाईकोर्ट ने महिला सरकारी कर्मचारियों के बाल्य देखभाल अवकाश (CCL) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि छुट्टी के लिए दी गई अर्जियों में बताई गई वास्तविक परिस्थितियों और जरूरतों का अधिकारियों को गंभीरता से मूल्यांकन करना चाहिए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि CCL को स्वतः मिलने वाला कानूनी अधिकार नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति बिस्वजीत पालित की पीठ ने राज्य सरकार को एक महिला स्नातकोत्तर शिक्षिका को 365 दिनों का बाल्य देखभाल अवकाश देने का निर्देश दिया। अदालत ने पाया कि शिक्षिका की अर्जी पर अधिकारियों ने उचित तरीके से विचार नहीं किया और उसे सही आधार के बिना खारिज किया गया।
मामला तापसी रॉय से जुड़ा है, जो एक अनुदान प्राप्त संस्थान में गणित की स्नातकोत्तर शिक्षिका हैं। अदालत ने स्कूल शिक्षा विभाग को उन्हें 16 जनवरी 2026 से 15 जनवरी 2027 तक CCL मंजूर करने का निर्देश दिया। यह अवकाश त्रिपुरा राज्य सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 1986 के नियम 39(सी) के तहत मांगा गया था।
याचिका में बताया गया कि तापसी रॉय का इकलौता बेटा नई दिल्ली स्थित केंद्रीय विद्यालय, जेएनयू में पढ़ता है। वह कक्षा नौ से कक्षा 10 में पहुंच चुका है और वर्ष 2027 में बोर्ड परीक्षा देने वाला है। ऐसे समय में उसकी पढ़ाई, ट्यूशन और भावनात्मक सहयोग के लिए मां की मौजूदगी आवश्यक होने का तर्क दिया गया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, उनके पति गृह मंत्रालय में ऐसी सेवा में हैं, जिसमें लगातार स्थानांतरण होता रहता है। इस वजह से बेटे की देखभाल के लिए उनका लगातार उपलब्ध रहना मुश्किल था।
तापसी रॉय ने CCL के लिए कई बार आवेदन किया, लेकिन उन्हें उचित निर्णय नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने माध्यमिक शिक्षा निदेशक के समक्ष भी विस्तृत आवेदन दिया, जिसमें बच्चे की पढ़ाई और देखभाल से जुड़ी परिस्थितियों का उल्लेख किया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि कार्यकारी निर्देश कानूनी नियमों के पूरक हो सकते हैं, लेकिन वे किसी वैधानिक नियम का स्थान नहीं ले सकते। अदालत की टिप्पणी से सरकारी महिला कर्मचारियों की CCL अर्जियों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में संवेदनशीलता और उचित मूल्यांकन की जरूरत रेखांकित हुई है।







