वर्षों की मेहनत, रातों की नींद, परिवार की उम्मीदें और आंखों में सजे सरकारी नौकरी के सपने—इन सबको एक आदेश के झटके में खत्म कर देना किसी भी युवा के लिए सिर्फ नौकरी छिनना नहीं, बल्कि उसकी पूरी संघर्ष-यात्रा पर चोट है। झारखंड के उन चयनित अभ्यर्थियों के लिए झारखंड हाई कोर्ट का फैसला इसलिए बड़ी राहत बनकर आया है, जिनके हाथों में नियुक्ति पत्र आने के बाद भविष्य की तस्वीर बदल गयी थी। 11वीं से 13वीं जेपीएससी परीक्षाओं और उनसे हुई नियुक्तियों को रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले पर हाईकोर्ट की रोक ने फिलहाल हजारों उम्मीदों को टूटने से बचा लिया है।
यह राहत उन परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिन्होंने अपने बच्चों के सपनों के साथ अपनी उम्मीदें जोड़ रखी थीं। सरकारी भर्ती परीक्षा किसी युवा के लिए महज एक प्रतियोगिता नहीं होती। इसके पीछे वर्षों की तैयारी, आर्थिक त्याग और मानसिक संघर्ष छिपा होता है। एक-एक अंक के लिए मेहनत करने वाला अभ्यर्थी जब चयनित होता है, तो उसे लगता है कि उसकी तपस्या सफल हुई। ऐसे में नियुक्ति के बाद पूरी प्रक्रिया ही रद्द कर दिये जाने का खतरा उसके लिए असहनीय मानसिक और आर्थिक संकट पैदा कर सकता है। हाई कोर्ट की अंतरिम रोक ने इसी पीड़ा को फिलहाल थामने का काम किया है। हालांकि, इस मामले का दूसरा पहलू भी उतना ही गंभीर है।
यदि भर्ती प्रक्रिया में वास्तव में अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई आवश्यक है। प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता से समझौता लाखों युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ है। एक ईमानदार अभ्यर्थी की सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास होता है कि परीक्षा निष्पक्ष होगी और उसकी मेहनत का मूल्यांकन योग्यता के आधार पर किया जायेगा। इस विश्वास को चोट पहुंचाना किसी भी व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। लेकिन, गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार लोगों और पूरी प्रक्रिया में चयनित सभी अभ्यर्थियों को एक ही तराजू में तौलना भी न्यायपूर्ण नहीं हो सकता। यदि किसी अभ्यर्थी की व्यक्तिगत भूमिका किसी अनियमितता में नहीं है, तो केवल व्यवस्था की खामी के कारण उसकी नौकरी समाप्त कर देना उसके साथ अन्याय होगा। यही वह बिंदु है जहां प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत महत्वपूर्ण हो जाता है। दोषी को सजा मिले, लेकिन निर्दोष को दंड न मिले—न्याय की बुनियादी भावना यही है।
हाई कोर्ट का फैसला इसी संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। राज्य सरकार का उद्देश्य यदि भर्ती प्रक्रिया को स्वच्छ और पारदर्शी बनाना है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि कार्रवाई प्रमाण और कानून के आधार पर हो, न कि सामूहिक रूप से। किसी परीक्षा में गड़बड़ी की आशंका और प्रत्येक चयनित अभ्यर्थी की संलिप्तता दो अलग-अलग बातें हैं। जांच की गंभीरता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि निर्दोषों के अधिकार भी अनिश्चितता में डाल दिए जायें। यह पूरा घटनाक्रम झारखंड की भर्ती व्यवस्था के सामने आत्ममंथन का अवसर भी है। जेपीएससी और जेएसएससी जैसी संस्थाओं पर युवाओं का भरोसा तभी कायम रहेगा, जब परीक्षा प्रक्रिया तकनीकी रूप से सुरक्षित, प्रशासनिक रूप से पारदर्शी और कानूनी रूप से मजबूत हो। प्रश्नपत्र की सुरक्षा से लेकर मूल्यांकन और परिणाम प्रकाशन तक हर स्तर पर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें किसी बाहरी हस्तक्षेप की गुंजाइश न्यूनतम हो।
सरकार को भी अब टकराव के बजाय समाधान का रास्ता तलाशना चाहिए। यदि जांच में दोष सामने आते हैं, तो दोषियों पर कार्रवाई हो, लेकिन जिन अभ्यर्थियों ने ईमानदारी से परीक्षा पास की है, उनके भविष्य को सुरक्षित रखने का रास्ता भी निकाला जाये। जरूरत पड़े तो प्रत्येक चयन की व्यक्तिगत जांच की जा सकती है। इससे न केवल न्याय का उद्देश्य पूरा होगा, बल्कि युवाओं में व्यवस्था के प्रति भरोसा भी मजबूत होगा। आज सबसे बड़ी जरूरत यही है कि भर्ती परीक्षाएं विवादों की नहीं, प्रतिभा और योग्यता की पहचान बनें। झारखंड के युवाओं ने बहुत इंतजार किया है। उनके सपनों को राजनीतिक या प्रशासनिक फैसलों की अनिश्चितता का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए। हाई कोर्ट की रोक ने फिलहाल उम्मीद की लौ बुझने से बचायी है। अब सरकार, आयोग और न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि अंतिम समाधान ऐसा हो, जिसमें दोषी बच न पाये और निर्दोष का सपना टूटे नहीं। यही न्याय की सबसे मानवीय और प्रभावी कसौटी होगी।
लेखक : मनोज कुमार







