
जालौन: उत्तर प्रदेश में जालौन जिले के उरई में विश्व मुखौटा दिवस के अवसर पर इन्टैक उरई चैप्टर और भारत विकास परिषद स्वामी विवेकानंद शाखा उरई के संयुक्त तत्वावधान में चूड़ी वाली गली स्थित संध्या पुरवार के निवास पर अनूठी मुखौटा दीर्घा सजाई गई।
दीर्घा के अवलोकन के दौरान मुख्य अतिथि होमगार्ड के जिला कमाडेंट राजेश कुमार सिंह ने कहा कि इस तरह की प्रदर्शनियां बच्चों के मानसिक विकास को नया आयाम देती हैं। मुखौटों का इतिहास बेहद रोचक और प्राचीन है। इनका उपयोग पहचान छिपाने के साथ धार्मिक अनुष्ठानों, सुरक्षा, मनोरंजन और अभिनय में सदियों से होता आया है।
दीर्घा संयोजक डॉ. हरिमोहन पुरवार ने बताया कि मुखौटों का इतिहास करीब नौ हजार वर्ष पुराना माना जाता है और भारत में इनका प्रयोग आदिकाल से होता रहा है। उन्होंने मारीच द्वारा स्वर्ण मृग का रूप धारण करने, भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार और भगवान गणेश के स्वरूप को मुखौटा परंपरा से जोड़ते हुए उदाहरण दिए। उन्होंने बताया कि प्राचीन मेक्सिको में भी करीब तीन हजार वर्ष पूर्व कला और धार्मिक अनुष्ठानों में मुखौटों के प्रयोग के प्रमाण मिलते हैं। असम में पात्रों को जीवंत बनाने, यूनान में नाट्य मंचन तथा विभिन्न देशों में पारंपरिक नृत्य और धार्मिक आयोजनों में मुखौटों का इस्तेमाल होता रहा है।
दीर्घा में करीब 50 प्रकार के बॉटल ओपनर प्रदर्शित किए गए, जिन पर आदिवासी मुखौटों की आकृतियां अंकित थीं। इसके अलावा 25 तरह के मुखौटा युक्त फ्रिज स्टिकर भी आकर्षण का केंद्र रहे। मेक्सिको, न्यूजीलैंड, मिस्र, अंडोरा और फिजी समेत कई देशों के ऐसे सिक्के प्रदर्शित किए गए, जिन पर मुखौटा धारण किए मानवों की आकृतियां अंकित थीं।
भारत, इंडोनेशिया, थाईलैंड, सिंगापुर, न्यू गिनी, मंगोलिया, हंगरी और उम अल कुवैन सहित विभिन्न देशों के डाक टिकट, जापान के प्रथम दिवस आवरण तथा मिस्र और उज्बेकिस्तान के बैंक नोट भी प्रदर्शित किए गए। विश्व प्रसिद्ध माया कैलेंडर का धात्विक टोकन और मुखौटा अंकित त्रिआयामी भूटानी डाक टिकट विशेष आकर्षण का केंद्र रहे।
प्रदर्शनी में भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और बलराम के मुखौटों के साथ नरसिंह भगवान, गणेश और राक्षसों के गुड़िया स्वरूप भी रखे गए। टेराकोटा मास्क, राजस्थानी मुखौटा कठपुतलियां, मां दुर्गा, मां काली और श्री हनुमान के धार्मिक मुखौटे तथा विभिन्न कबीलों के रंग-बिरंगे मुखौटे भी प्रदर्शित किए गए।
कपाली मुखौटों के साथ तंजानिया, पलाऊ, न्यू आयरलैंड, कैमरून और इक्वेटोरियल गिनी के रजतीय अपरिचालित कपाली सिक्के भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे। 17वीं शताब्दी की नरसिंह चित्रयुक्त मैसूर की स्वर्ण मुद्रा, मदुरै की ताम्र मुद्राएं और विभिन्न टेंपल टोकन को भी लोगों ने सराहा।
प्रदर्शित सामग्री संध्या पुरवार और डॉ. हरिमोहन पुरवार के निजी संग्रह से प्रस्तुत की गई। डॉ. हरिमोहन पुरवार और किशोरी शरण शांडिल ने मुख्य अतिथि को अंगवस्त्र पहनाकर स्वागत किया। संध्या पुरवार, उषा सिंह निरंजन और मनीषा द्विवेदी ने स्मृति चिह्न भेंट किया।
इस अवसर पर प्रदीप पाटकर, माया सिंह, विश्वनाथ पुरवार, सुनीता राज, नवनीत श्रीवास्तव, अय्यूब अहमद खां, विकास आनंद और राजकुमार सहित अन्य लोग मौजूद रहे। अंत में चंचल मिश्रा ने सभी आगंतुकों के प्रति आभार जताया।






