
राजनांदगांव/डोंगरगढ: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) छत्तीसगढ़ में इन दिनों संगठनात्मक कलह अपने चरम पर है। राजनांदगांव जिले में पार्टी के भीतर से उठ रही बगावत की आवाजें अब खुलकर सामने आ गई हैं। एक तरफ जहां पार्टी अनुशासनहीनता का हवाला देते हुए निष्कासन का ‘डंडा’ चला रही है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी द्वारा जारी किए गए इन आदेशों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी की गिरती साख को बचाने की एक नाकाम कोशिश और ‘चेहरे की चमक’ बचाने का पाखंड करार दे रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी, छत्तीसगढ़ प्रदेश कार्यालय द्वारा 06 अगस्त 2026 को जारी पत्रों के माध्यम से राजनांदगांव जिले के अंतर्गत डोंगरगढ़ के पांच प्रमुख नेताओं को 6 वर्षों के लिए प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया गया है। निष्कासित किए गए नेताओं में प्रिंस कक्कड़, वीरेन्द्र साहू, अनिल पाण्डे, परविन्दर सिंह मोन्टी और संतोष राव शामिल हैं।
पार्टी ने इन नेताओं पर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों से संगठन, राज्य शासन और वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ टिप्पणी कर छवि धूमिल करने का आरोप लगाया है। यह आदेश प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंह देव के निर्देशानुसार और प्रदेश महामंत्री व मुख्यालय प्रभारी डॉ. नवीन मार्कण्डेय के हस्ताक्षर से जारी किए गए हैं।
इस निष्कासन आदेश ने पार्टी की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। निष्कासित किए गए नेताओं और कार्यकर्ताओं ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक 14 जुलाई 2026 को पार्टी की ओर से इन नेताओं को ‘कारण बताओ’ नोटिस दिया गया, जिसमें 24 घंटे में जवाब मांगा गया था।
15 जुलाई*को सभी संबंधित नेताओं ने जिला कार्यालय जाकर अपना विस्तृत जवाब दर्ज कराया। जवाब दाखिल करने के चार दिन बाद, इन नेताओं को पुनः जिले में बुलाकर एक स्थानीय पदाधिकारी, रामजी भारती से माफी मांगने का दबाव बनाया गया। नेताओं ने साफ शब्दों में इनकार कर दिया कि वे किसी भी स्थिति में माफी नहीं मांगेंगे।
27 जुलाई, इस घटनाक्रम के विरोध में डोंगरगढ़ के 111 कार्यकर्ताओं और नेताओं ने सामूहिक रूप से अपना इस्तीफा पार्टी को सौंप दिया था।
अब सवाल यह है कि जो नेता 27 जुलाई को ही पार्टी छोड़ चुके थे, उन्हें 06 अगस्त को निष्कासित करने का आदेश जारी करना कितना तर्कसंगत है? जानकारों का मानना है कि जब पार्टी ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया, तो अपनी किरकिरी बचाने और यह संदेश देने के लिए कि “हमने निकाला है, वे भागे नहीं हैं,” यह पत्र जारी किया गया है।
इस बीच, पार्टी ने डोंगरगढ़ मंडल इकाई को भी तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। यह कदम संगठन के भीतर गहराई तक फैली नाराजगी और असंतोष को दबाने की कोशिश माना जा रहा है। हालांकि, मंडल इकाई का भंग होना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राजनांदगांव जिले में बगावत की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं।
एक तरफ नेताओं का स्वेच्छा से इस्तीफा देना और दूसरी तरफ पार्टी द्वारा उन्हें अनुशासनहीनता के नाम पर निष्कासित करने का फरमान जारी करना—यह साफ दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ भाजपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। राजनांदगांव में उपजी यह बगावत आने वाले दिनों में पार्टी के लिए और अधिक राजनीतिक सिरदर्द साबित हो सकती है।






