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काशी में तीन दिवसीय ऐतिहासिक रथयात्रा मेले का भव्य आगाज़, उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

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The three-day historic Rath Yatra fair begins in Kashi with a grand start, with a huge influx of devotees.

वाराणसी: भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ काशी नगर भ्रमण के उपरांत गुरुवार को रथ पर विराजमान होकर श्रद्धालुओं को दर्शन दे रहे हैं। भोर में मंगला आरती के बाद पट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। सुबह से ही भगवान के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। इस अवसर पर भगवान को 56 प्रकार के व्यंजनों भोग अर्पित किया गया। प्रभु को तुलसी की माला अतिप्रिय हैं। इसी के साथ तीन दिवसीय रथयात्रा मेले का भव्य शुभारंभ हो गया।


रथयात्रा क्षेत्र में सुबह पांच बजे से ही श्रद्धालुओं का आगमन शुरू हो गया था। मंगला आरती के दौरान घंटा-घड़ियाल, शंखनाद और डमरुओं की गूंज के बीच “जय जगन्नाथ” के उद्घोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने आरती में शामिल होकर भगवान से सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना की। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पुरी के बाद वाराणसी की रथयात्रा का विशेष महत्व है। इसे “मिनी पुरी रथयात्रा” के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ वर्ष में केवल तीन दिनों तक रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि इस अवसर पर दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु काशी पहुंचते हैं।

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करीब सवा दो सौ वर्ष से अधिक पुराने इस रथयात्रा मेले का इतिहास वर्ष 1790 से जुड़ा माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार, गुजरात से पुरी होते हुए स्वामी तेजोनिधि काशी आए और गंगा तट पर निवास करने लगे। एक वर्ष गंगा में आई भीषण बाढ़ के कारण उनके नियमित राग-भोग और पूजा-अर्चना में व्यवधान उत्पन्न हुआ। इसी दौरान उन्हें स्वप्न में भगवान जगन्नाथ ने काशी में भी अपनी पूजा और रथयात्रा प्रारंभ करने का निर्देश दिया।


इसके बाद स्वामी तेजोनिधि ने वर्ष 1802 में पुरी की तर्ज पर काशी में रथयात्रा की शुरुआत की, जो समय के साथ एक विशाल धार्मिक मेले के रूप में स्थापित हो गई। मान्यता के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ का स्नानोत्सव होने के बाद वे अस्वस्थ हो जाते हैं। इस दौरान उन्हें औषधीय काढ़ा पिलाया जाता है और लगभग 15 दिनों के विश्राम के बाद स्वस्थ होकर भगवान नगर भ्रमण के लिए रथ पर विराजमान होते हैं। काशी में भगवान पहले पालकी से रथयात्रा स्थल तक लाए जाते हैं, जिसे स्थानीय परंपरा में उनके ससुराल जाने का प्रतीक माना जाता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक मेले में प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं।