नयी दिल्ली: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने स्वदेशी नेत्र एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) प्रणाली का फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस (FOC) प्रमाणपत्र भारतीय वायुसेना को सौंप दिया है। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के साथ नेत्र प्रणाली अब पूरी तरह से परिचालन के लिए तैयार हो गई है। इससे भारतीय वायुसेना की हवाई निगरानी, युद्ध प्रबंधन और दुश्मन की गतिविधियों पर रियल-टाइम नजर रखने की क्षमता पहले से कहीं अधिक मजबूत होगी।
बेंगलुरु में आयोजित समारोह में वायुसेना उप प्रमुख एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने कहा कि नेत्र प्रणाली ने ऑपरेशन सिंदूर और बालाकोट एयर स्ट्राइक जैसे अभियानों के दौरान अपनी विश्वसनीयता और प्रभावशीलता साबित की है। उन्होंने कहा कि स्वदेशी रक्षा तकनीक भारत को बदलते युद्ध परिदृश्य के अनुसार तेजी से अपनी सैन्य क्षमताओं को उन्नत करने में सक्षम बनाती है। इस सफलता का श्रेय डीआरडीओ, भारतीय वायुसेना और घरेलू रक्षा उद्योगों के बीच बेहतर तालमेल को दिया गया।
डीआरडीओ की महानिदेशक डॉ. राजालक्ष्मी मेनन ने बताया कि नेत्र परियोजना को विकसित करने के दौरान कई तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन सफल उड़ान परीक्षणों और लगातार सुधार के बाद इसे अंतिम परिचालन मंजूरी मिल गई। वर्ष 2017 में इसे प्रारंभिक परिचालन मंजूरी (IOC) मिली थी, जिसके बाद व्यापक परीक्षण किए गए।
नेत्र प्रणाली को भारत की “आसमान में उड़ती तीसरी आंख” भी कहा जाता है। यह अत्याधुनिक रडार से लैस विमान सैकड़ों किलोमीटर दूर तक दुश्मन के लड़ाकू विमान, ड्रोन, हेलिकॉप्टर और क्रूज मिसाइल जैसी हवाई गतिविधियों का समय रहते पता लगाने में सक्षम है। इतना ही नहीं, यह उड़ते हुए कमांड सेंटर की तरह काम करते हुए सुरक्षित डेटा लिंक के माध्यम से जमीन पर मौजूद कमांड सेंटर और लड़ाकू विमानों को रियल-टाइम जानकारी उपलब्ध कराता है। इससे दुश्मन के लक्ष्यों की पहचान, ट्रैकिंग और जवाबी कार्रवाई की गति और सटीकता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी तथा भारतीय वायुसेना की सामरिक क्षमता को नई मजबूती मिलेगी।







