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मृदा सौरीकरण से करें कीट, रोग और खरपतवारों का नियंत्रण : डॉ. आदित्य पटेल

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Control pests, diseases and weeds through soil solarization: Dr. Aditya Patel

सासाराम (रोहतास)। आज के समय में रसायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे समय में जैविक और पर्यावरण अनुकूल तकनीकों की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ गई है। मृदा सौरीकरण या सोलराइजेशन एक ऐसी ही तकनीक है जो बिना किसी रासायनिक उपयोग के मिट्टी में मौजूद हानिकारक कीटों, रोगाणुओं और खरपतवारों को नियंत्रित करने में प्रभावी सिद्ध होती है। गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्याल, जमुहार, सासाराम के अंतर्गत संचालित नारायण कृषि विज्ञान संस्थान के कीट विज्ञान विभाग के सहायक प्राचार्य डॉ. आदित्य पटेल मृदा सौरीकरण का परिचय देते हुए बताते हैं की मृदा सोलराइजेशन एक ऐसी प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें मिट्टी को गर्म करके उसमें मौजूद हानिकारक जीवों को नष्ट किया जाता है।

इस विधि में खेत की गहरी जुताई के बाद मिट्टी को समतल किया जाता है और उसे पारदर्शी पॉलीथीन शीट से ढक दिया जाता है। यह कार्य विशेषकर गर्मी के मौसम (मई-जून-जुलाई) में किया जाता है जब सूरज की किरणें तीव्र होती हैं। पारदर्शी पॉलीथीन सूर्य की किरणों को मिट्टी में प्रवेश करने देती है लेकिन मिट्टी से निकलने वाली ऊष्मा को वापस बाहर नहीं जाने देती। इसकी प्रक्रिया आमतौर पर 4 से 6 सप्ताह तक चलती है। इससे मिट्टी का तापमान 45 से 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकता है। मृदा सौरीकरण मिट्टी में छिपे हुए विभिन्न प्रकार के कीट जैसे सफेद ग्रब, दीमक तथा अन्य कीटों के लार्वा और अंडों को समाप्त कर देता है। अत्यधिक तापमान से ये कीट जीवित नहीं रह पाते और अगली फसल पर उनका हमला कम हो जाता है।

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कई प्रकार के फफूंद एवं बैक्टीरिया जनित रोग जैसे कि विल्ट, डैम्पिंग-ऑफ, और रूट रॉट आदि मिट्टी में ही उत्पन्न होते हैं। सोलराइजेशन के दौरान उच्च तापमान इन रोगों के कारकों को समाप्त कर देता है, जिससे पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और फसलें स्वस्थ रहती हैं। डॉ. पटेल आगे बताते हैं की मृदा सौरीकरण खरपतवार नियंत्रण में भी बहुत प्रभावी है। इसके दौरान मिट्टी में दबे खरपतवारों के बीज नष्ट हो जाते हैं या अंकुरण की शक्ति खो देते हैं। इससे खेत में खरपतवार की मात्रा कम हो जाती है और किसानों को रासायनिक खरपतवारनाशकों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। अंततः यह एक सरल, प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल तकनीक है, जो किसानों को कीट, रोग और खरपतवार से निपटने में मदद करती है। यह जैविक कृषि को बढ़ावा देती है और मिट्टी की उत्पादकता को बनाए रखने में सहायक है।