नयी दिल्ली। दिल्ली की एक अदालत ने महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत आरोपी एक व्यक्ति को बरी कर दिया है, क्योंकि उसे किसी संगठित अपराध गिरोह का सदस्य स्थापित करने के लिए कोई ठोस या विश्वसनीय सबूत नहीं थे। अदालत के आदेश में कहा कि आरोपी तलविंदर उर्फ जारा को मकोका की धारा 3 और 4 के तहत दंडनीय अपराधों से मुक्त किया जाता है। अदालत ने कहा, “हालांकि, आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 174-ए (पार्ट-I) के तहत दंडनीय अपराध के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है, जिसके लिए उसके खिलाफ आरोप तय किए जाने योग्य हैं।
श्री जारा को निर्देश दिया जाता है कि वह एक सप्ताह के भीतर समान राशि के एक मुचलके के साथ 50,000 रुपये का जमानत बांड भरे।” अदालत ने पाया कि उसके खिलाफ केवल एक आपराधिक मामले का हवाला दिया गया था, जिसमें वह पहले ही बरी हो चुका था। यह भी पाया गया कि मकोका के तहत दर्ज इकबालिया बयानों में जबरन वसूली या गैरकानूनी गतिविधि की विशिष्ट घटनाएं नहीं थी, केवल सामान्य दावे थे। अदालत ने कहा, “बयानों में स्पष्ट रूप से जबरन वसूली की किसी विशिष्ट घटना या किसी अन्य गैरकानूनी गतिविधि का कोई संदर्भ नहीं है।” अदालत ने यह भी कहा कि 2013 के बाद आरोपी की किसी भी आपराधिक संलिप्तता को इंगित करने वाली कोई सामग्री नहीं थी। मामले में पेश अधिवक्ता दीपक शर्मा ने कहा, “अवैध रूप से अर्जित संपत्तियों और नकद जमा के आरोपों के संबंध में अदालत ने ऐसा कोई सबूत नहीं पाया कि ये संपत्तियां संगठित अपराध की कमाई से हासिल की गई थीं।
यह देखा गया कि विचाराधीन संपत्तियां गिरोह के कथित अस्तित्व से पहले आरोपी के पिता द्वारा खरीदी गई थीं।” अदालत ने टिप्पणी की, “ऐसी कोई धारणा नहीं बनाई जा सकती कि आरोपी और उसके परिवार के सदस्यों के कब्जे में जो भी पैसा पाया गया वह दूषित (गलत) पैसा था।” अदालत ने हालांकि आईपीसी की धारा 174-ए (पार्ट I) के तहत आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला पाया और उल्लेख किया कि उद्घोषणा के उचित प्रकाशन के बावजूद वह निर्धारित अवधि के भीतर अदालत के सामने पेश होने में विफल रहा। अदालत ने बचाव पक्ष के वकील के इस तर्क को खारिज कर दिया कि लंबित अग्रिम जमानत याचिका ने उसे उद्घोषणा का पालन करने से मुक्त कर दिया था। अदालत ने कहा कि उसे इस संबंध में कोई अंतरिम सुरक्षा प्रदान नहीं की गई थी।







