
बीबीसी मराठी से बातचीत में अभिजीत दीपके ने बताया कैंपेन शुरू करने की वजह, कहा- युवाओं की तुलना ‘कॉकरोच और परजीवी’ से करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण
नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की कथित टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर शुरू हुआ विरोध अभियान अब चर्चा का विषय बन गया है। इस अभियान को शुरू करने वाले अभिजीत दीपके ने बीबीसी न्यूज़ मराठी से बातचीत में विस्तार से बताया कि आखिर उन्होंने यह मुहिम क्यों शुरू की और इसके पीछे उनकी सोच क्या थी। अभिजीत दीपके के अनुसार, वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर मुख्य न्यायाधीश का एक बयान देख रहे थे, जिसमें कथित तौर पर देश के युवाओं की तुलना “कॉकरोच” और “परजीवियों” से की गई थी। दीपके ने कहा कि यह बयान उन्हें बेहद हास्यास्पद और चिंताजनक लगा।
उन्होंने कहा कि देश का मुख्य न्यायाधीश संविधान का संरक्षक माना जाता है और वही संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। ऐसे में अगर संवैधानिक संस्थाओं के सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति युवाओं और आलोचनात्मक विचार रखने वालों के लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करे, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ माना जाएगा। अभिजीत दीपके ने कहा, “मैंने सोचा कि जिस व्यक्ति की जिम्मेदारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना है, वह युवाओं की तुलना कॉकरोच और परजीवियों से कैसे कर सकता है। यही बात मुझे भीतर तक परेशान कर गई और मैंने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाने का फैसला किया।
उन्होंने बताया कि उनका उद्देश्य किसी संस्था का अपमान करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और युवाओं की आवाज़ को सम्मान दिलाना है। उनका कहना है कि सोशल मीडिया आज युवाओं के लिए अपनी बात रखने का एक बड़ा माध्यम बन चुका है और लोकतंत्र में आलोचना को नकारात्मक नहीं बल्कि स्वस्थ प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। इस बयान और उसके बाद शुरू हुए सोशल मीडिया कैंपेन को लेकर इंटरनेट पर बहस तेज हो गई है। एक ओर लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे न्यायपालिका की गरिमा से जोड़कर देख रहे हैं। फिलहाल यह मुद्दा सोशल मीडिया पर लगातार ट्रेंड कर रहा है और राजनीतिक व सामाजिक हलकों में भी चर्चा का विषय बना हुआ है।






