भुवनेश्वर: ओडिशा के गंजम जिले में सामाजिक सुरक्षा पेंशन मिलने में तीन महीने की देरी के चलते एक बुजुर्ग विधवा की मौत का मामला कोई अकेली घटना नहीं है बल्कि यह राज्य की पेंशन वितरण प्रणाली के बड़े पैमाने पर विफल होने का नतीजा थी, जिसके कारण लगभग 18 लाख लोगों को महीनों तक पेंशन नहीं मिल पाई। तीन अधिकार संगठनों की एक संयुक्त जांच रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।
‘राइट टू फूड कैंपेन’, ‘सिविल सोसाइटी फोरम फॉर ह्यूमन राइट्स’ और ‘कैंपेन फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी’ द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में बेगुनियापाडा ब्लॉक के चदेइयापाडा गांव की बी. साबित्री डोरा की मौत की जांच की गई। कथित तौर पर, 1,000 रुपये की मासिक विधवा पेंशन न मिल पाने के कारण उन्होंने 16 जून को जहर खा लिया था। रिपोर्ट में इस घटना को किसी व्यक्ति विशेष की त्रासदी के बजाय “तंत्र की विफलता” बताते हुए कहा गया है कि किसी अन्य वैकल्पिक व्यवस्था या आपातकालीन इंतज़ाम के बिना, राज्य का डिजिटल पेंशन भुगतान प्रणाली पर निर्भर रहना हज़ारों सबसे गरीब और कमज़ोर नागरिकों को उनकी आय के एकमात्र स्रोत से वंचित कर गया।
रिपोर्ट के अनुसार, साबित्री डोरा, जो लगभग 65 वर्ष की थीं, अपनी मासिक पेंशन के सहारे ही गुज़ारा कर रही थीं, क्योंकि खराब सेहत के कारण उन्हें लगभग एक दशक पहले दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर काम करना छोड़ना पड़ा था। उन्हें राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम के तहत हर महीने 5 किलो चावल भी मिलता था, लेकिन दवाइयां खरीदने और रोज़मर्रा के अन्य खर्चों को पूरा करने के लिए वह पेंशन पर ही निर्भर थीं।
जांच टीम को पता चला कि अप्रैल और जून 2026 के बीच लगभग तीन महीनों तक उनकी पेंशन उनके खाते में नहीं आई थी। इस दौरान, उन्होंने कथित तौर पर बकाया पेंशन के बारे में पता करने के लिए ग्राम पंचायत कार्यालय, ब्लॉक कार्यालय और अपनी बैंक शाखा के कई चक्कर लगाए, लेकिन उन्हें कोई मदद नहीं मिली। उनके परिवार ने टीम को बताया कि लंबे समय तक बनी अनिश्चितता, बढ़ती आर्थिक तंगी और लाचारी की भावना ने आखिरकार उन्हें यह यह कदम उठाने पर मजबूर कर दिया।
यह रिपोर्ट उनकी मौत को राज्य भर में पेंशन वितरण में आई रुकावट के संदर्भ में देखती है। इसमें कहा गया है कि डिजिटल डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) सिस्टम में तकनीकी खराबी के कारण गंजम ज़िले में 1.49 लाख से ज़्यादा लाभार्थियों और पूरे ओडिशा में लगभग 18 लाख पेंशनभोगियों को कथित तौर पर लगातार तीन महीनों तक पेंशन नहीं मिली।
हालांकि राज्य सरकार ने इस रुकावट के लिए एसएनए स्पर्श भुगतान प्लेटफ़ॉर्म में खराबी को ज़िम्मेदार ठहराया और बाद में भरोसा दिलाया कि सभी बकाया राशि का भुगतान कर दिया जाएगा, लेकिन रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि मैनुअल या आपात भुगतान प्रणाली नहीं होने की वजह से कमज़ोर लाभार्थियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।
रिपोर्ट में कहा गया है, “इस प्रणाली ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिसमें खाने और दवाइयों के लिए हर महीने मिलने वाले 1,000 रुपये पर पूरी तरह निर्भर एक बुजुर्ग विधवा बिना किसी सहारे के रह गई, क्योंकि तकनीकी खराबी पर उसका कोई बस नहीं था।” इसमें यह भी कहा गया है कि हालांकि यह मामला सार्वजनिक विवाद बनने के बाद लाखों लाभार्थियों को बकाया राशि जारी कर दी गई, लेकिन इस देरी ने उन लोगों के लिए सुरक्षा उपायों की कमी और तत्परता न होने की बात उजागर की, जो गुज़ारे के लिए पूरी तरह पेंशन पर निर्भर हैं।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सरकार डिजिटल खराबी के समय नकद भुगतान और घर-घर जाकर पेंशन बांटने की व्यवस्था को विकल्प के तौर पर बनाए रखे और सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंद लाभार्थियों-जैसे अकेले रहने वाले बुजुर्ग, विधवाएं, दिव्यांग और बेसहारा लोग की एक प्राथमिकता सूची तैयार करे ताकि उन्हें बिना रुकावट मदद मिलती रहे। इसमें अप्रैल-जून 2026 में पेंशन में आई रुकावट की स्वतंत्र समीक्षा की भी मांग की गई है और राज्य सरकार से आग्रह किया गया है कि वह इसकी रिपोर्ट ओडिशा विधानसभा के सामने पेश करे।







