नयी दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि पूर्वोत्तर भारत में पारंपरिक मोटे अनाज यानी श्रीअन्न (मिलेट्स) की खेती को दोबारा बढ़ावा मिल रहा है। युवा किसान और उद्यमी पारंपरिक फसलों को नए खाद्य उत्पादों और बाजार के अवसरों से जोड़ रहे हैं। इससे किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के नए रास्ते खुल रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने रविवार को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ की 139वीं कड़ी में पूर्वोत्तर के विभिन्न गांवों में मिलेट्स की खेती को पुनर्जीवित करने के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत की पहल पर वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष के रूप में मनाया गया था। इससे दुनिया भर में श्रीअन्न के पोषण संबंधी महत्व और भारतीय परंपरा से इसके जुड़ाव के प्रति जागरूकता बढ़ी।
मेघालय में मिलेट्स से बन रहे नए उत्पाद
प्रधानमंत्री ने मेघालय के पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले के खांडुली गांव का उदाहरण देते हुए बताया कि यहां कई पीढ़ियों से मिलेट्स स्थानीय खानपान का हिस्सा रहे हैं। हालांकि, समय के साथ इसकी खेती करने वाले किसानों की संख्या घटने लगी थी।
ऐसे में गांव की दो सहेलियों ने मिलेट्स से कुकीज, केक, मफिन और शिशुओं के लिए खाद्य उत्पाद तैयार करने की पहल की। इन उत्पादों के जरिए पारंपरिक अनाज का मूल्य संवर्धन हुआ और बाजार में इसकी मांग बढ़ने लगी। इसका सकारात्मक असर स्थानीय किसानों पर भी पड़ा और उन्होंने दोबारा मिलेट्स की खेती शुरू की।
आधुनिक खेती से बढ़ी किसानों की आय
नरेंद्र मोदी ने पश्चिम गारो हिल्स जिले के सादोलपाड़ा गांव में किसान चेकजिंग संगमा के प्रयासों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि चेकजिंग संगमा ने मिलेट्स के महत्व को समझते हुए आधुनिक तरीकों से इसकी खेती शुरू की। इससे उनकी आय में वृद्धि हुई और गांव के अन्य लोगों में भी इस फसल के प्रति रुचि बढ़ी।
नागालैंड में फिर शुरू हुई पारंपरिक खेती
प्रधानमंत्री ने नागालैंड के कोहिमा जिले के केजोमा गांव का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां एक दशक से अधिक समय तक मिलेट्स की खेती बंद रही थी। वर्ष 2024 में ग्रामीणों ने इसे फिर से शुरू किया और 2025 में गांव में पहला मिलेट्स महोत्सव आयोजित किया गया। अब यहां भी मिलेट्स से बने खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ रही है।
पारंपरिक हुनर से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती
प्रधानमंत्री ने कहा कि पूर्वोत्तर के गांवों के ये उदाहरण दिखाते हैं कि पारंपरिक फसलों को आधुनिक तकनीक, नए उत्पादों और बाजार की जरूरतों से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। युवा अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हुए रोजगार और उद्यमिता के नए अवसर तैयार कर रहे हैं।







