जालौन: अंग्रेजी शासनकाल में ‘पश्चिम भारत का प्रवेश द्वार’ कहलाने वाला उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक नगर कालपी आज अपनी गौरवशाली विरासत के बावजूद उपेक्षा का शिकार होता नजर आ रहा है। जालौन जिले में यमुना नदी के तट पर स्थित यह नगर भारतीय संस्कृति, धर्म, इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम की अनगिनत स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए है। हालांकि, संरक्षण के अभाव और सरकारी उदासीनता के चलते यहां की कई ऐतिहासिक धरोहरें धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होती जा रही हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरिमोहन पुरवार के अनुसार कालपी का प्राचीन नाम ‘कालप्रिया’ था और इसकी स्थापना चौथी शताब्दी में राजा वासुदेव ने की थी। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक महर्षि वेदव्यास ने इसी भूमि पर तपस्या की थी और महाभारत की रचना से भी इस स्थान का संबंध माना जाता है। यही कारण है कि कालपी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व भी बेहद खास है।
मध्यकाल में कालपी चंदेल शासकों का प्रमुख व्यापारिक केंद्र रहा। बाद में यह दिल्ली सल्तनत, मुगल साम्राज्य और फिर मराठाओं के अधीन रहा। अकबर के शासनकाल में यहां तांबे के सिक्कों की टकसाल संचालित होती थी और बीरबल का संबंध भी इसी क्षेत्र से माना जाता है। वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और अन्य क्रांतिकारियों ने कालपी में अंग्रेजों के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष किया, जिसने इसे आजादी की लड़ाई का महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया।
कालपी के सूर्य मंदिर, वेदव्यास मंदिर, बीरबल का किला, लंका मीनार, चौरासी गुम्बद और यमुना के प्राचीन घाट इसकी समृद्ध विरासत की गवाही देते हैं। कभी हस्तनिर्मित कागज उद्योग और व्यापारिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध यह नगर आज भी पर्यटन की अपार संभावनाएं रखता है।
इतिहासकारों का मानना है कि यदि कालपी की ऐतिहासिक धरोहरों का वैज्ञानिक संरक्षण किया जाए और पर्यटन के लिहाज से समुचित विकास किया जाए, तो यह नगर बुंदेलखंड ही नहीं बल्कि पूरे देश के प्रमुख सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकता है। आज भी कालपी भारत के गौरवशाली अतीत, सांस्कृतिक विरासत और स्वतंत्रता संग्राम की अमर गाथा का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।







