IIT-BHU की बड़ी खोज: हरी रोशनी से बैक्टीरिया पर वार, चूहों के घाव 99% तक भरे
IIT-BHU's breakthrough: Green light kills bacteria, healing rat wounds by 99%

वाराणसी: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (बीएचयू) के शोधकर्ताओं ने बैक्टीरियाई संक्रमण से मुकाबला करने के लिए प्रकाश आधारित एक नई तकनीक विकसित की है। हरी रोशनी से सक्रिय होने वाली यह तकनीक न केवल बैक्टीरिया की वृद्धि रोकने में प्रभावी पाई गई, बल्कि संक्रमण फैलाने वाली उनकी सुरक्षात्मक जैव-परत को नष्ट करने में भी कारगर साबित हुई है। इस शोध से भविष्य में बैक्टीरियल संक्रमण के उपचार के लिए नए विकल्प विकसित होने की संभावना जगी है।

यह अध्ययन बीएचयू के रसायन विज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. साम्या बनर्जी और जैव-चिकित्सा अभियांत्रिकी विभाग के डॉ. सुदीप मुखर्जी के नेतृत्व में किया गया। शोधकर्ताओं ने इस दौरान ऑस्मियम आधारित तीन विशेष रासायनिक यौगिक विकसित किए। ये प्रकाश-सक्रिय धातु-आधारित जीवाणुरोधी यौगिक हैं, जो हरी रोशनी के संपर्क में आने पर प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन अणु उत्पन्न करते हैं। ये अणु बैक्टीरिया की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर उनकी वृद्धि को रोकने में मदद करते हैं।

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ई. कोलाई और अन्य बैक्टीरिया पर किया गया परीक्षण

शोध के दौरान विकसित यौगिकों का परीक्षण ई. कोलाई, स्टैफिलोकोकस ऑरियस और बैसिलस सब्टिलिस जैसे बैक्टीरिया पर किया गया। इनमें ओएस-1 नामक यौगिक ने सबसे बेहतर परिणाम दिखाए। हरी रोशनी के साथ इसके इस्तेमाल से ई. कोलाई और बैसिलस सब्टिलिस की जैव-परत में करीब 85 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। खास बात यह रही कि इसका प्रभाव पहले से विकसित परिपक्व जैव-परत पर भी देखा गया।

चूहों के घाव 11वें दिन 99 प्रतिशत तक भरे

इस तकनीक की प्रभावशीलता जांचने के लिए बैक्टीरिया से संक्रमित घावों वाले चूहों पर भी परीक्षण किया गया। अध्ययन के अनुसार, ओएस-1 और हरी रोशनी से उपचार के 11वें दिन घाव करीब 99 प्रतिशत तक भर गए। यह परिणाम संक्रमण के उपचार में इस तकनीक की संभावित उपयोगिता को दर्शाता है।

मानव उपचार से पहले जरूरी होंगे और परीक्षण

यह शोध एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बैक्टीरिया में बढ़ते प्रतिरोध की चुनौती से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, मनुष्यों के उपचार में इसके इस्तेमाल से पहले दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया पर व्यापक परीक्षण और दीर्घकालिक सुरक्षा अध्ययन करना आवश्यक होगा।

यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका Communications Chemistry में प्रकाशित हुआ है।