नयी दिल्ली: भारत की आबादी हर साल बढ़ती है, यह एक सामान्य बात है। लेकिन इतिहास के पन्नों में एक साल ऐसा भी दर्ज है जब देश की जनसंख्या बढ़ने के बजाय कम हो गई थी। यह बात है 1921 की जनगणना की। उस वक्त जो आंकड़े सामने आए, उन्होंने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। आजादी से पहले हुई यह इकलौती ऐसी जनगणना थी जिसमें विकास की कहानी नहीं,बल्कि बर्बादी का हिसाब लिखा था।
आज हम जिस तरह कोविड-19 की बात करते हैं, ठीक 100 साल पहले स्पैनिश फ्लू नाम की महामारी ने पूरी दुनिया में कोहराम मचाया था। प्रथम विश्व युद्ध से लौटे सैनिकों के जरिये यह बीमारी भारत पहुंची और देखते ही देखते लाशों के ढेर लग गए। कोविड के दौर में तो हमारे पास अस्पताल और टीके थे, लेकिन उस वक्त देश पूरी तरह बेबस था। जहां कोरोना काल में लाखों लोगों की जान गई, वहीं स्पैनिश फ्लू ने महज दो साल के भीतर भारत के करीब सवा करोड़ लोगों को निगल लिया। यही वजह थी कि जब 1921 में लोगों को गिना गया तो देश की आबादी बढ़ने के बजाय 0.31 प्रतिशत घट चुकी थी। उस दौर की तबाही का सबसे बुरा असर गांवों में देखने को मिला। आज की महामारी में तो शहरों में ज्यादा भीड़भाड़ थी,लेकिन 100 साल पहले गांवों की हालत बदतर हो गई थी।
इलाज की कोई सुविधा न होने के कारण गांव के गांव साफ हो गए। आलम यह था कि खेतों में फसल काटने वाला कोई नहीं बचा था। भुखमरी और बीमारी ने मिलकर ग्रामीण भारत की कमर तोड़ दी थी। जनगणना की रिपोर्ट बताती है कि शहरों के मुकाबले गांवों में मरने वालों की तादाद कहीं ज्यादा थी, क्योंकि वहां न डॉक्टर थे और न ही दवाएं। इतिहासकार बताते हैं कि 1921 में आबादी घटने के पीछे सिर्फ बीमारी ही नहीं, बल्कि भीषण अकाल भी था। 1911 में देश की आबादी 25.20 करोड़ थी, जो 1921 में घटकर 25.13 करोड़ रह गई। यानी 10 साल में करीब पौने आठ लाख लोग कम हो गए। जनगणना के इतिहास में यह पहली और आखिरी बार था जब जनसंख्या का आंकड़ा माइनस में गया। आज जब हम आधुनिक सुविधाओं के बीच रह रहे हैं, तब 1921 की यह रिपोर्ट याद दिलाती है कि एक महामारी किस तरह संहार कर सकती है। इसीलिए, जनसंख्या का आंकड़ा और उस हिसाब से देश की तैयारियां बहुत जरूरी हैं।







