वाशिंगटन : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वीकार किया है कि ईरान के साथ जारी युद्ध का असर देश के मध्यावधि चुनावों पर पड़ा है। उन्होंने माना कि पिछले आठ महीनों से चल रहे संघर्ष के कारण ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी हुई, जिससे अमेरिकी मतदाताओं में नाराजगी देखने को मिली। हालांकि, ट्रंप ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई ऐसा कदम था, जिसे उठाना उनके लिए जरूरी हो गया था।
मध्यावधि चुनावों के नतीजों के बाद पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि ईरान का मामला ऐसा था, जिसमें अमेरिका को कार्रवाई करनी ही पड़ी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका प्रशासन इस संघर्ष को जारी रखे हुए है। राष्ट्रपति के इस बयान से साफ संकेत मिलता है कि चुनावी नुकसान के बावजूद ईरान के खिलाफ उनकी नीति में तत्काल बदलाव की संभावना कम है।
चुनावी नतीजों के बाद ट्रंप ने राजनीतिक रूप से कुछ नरम रुख अपनाने के संकेत भी दिए हैं। उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ मिलकर काम करने की इच्छा जताई, लेकिन साथ ही विपक्ष के एजेंडे को लेकर अपनी असहमति भी जाहिर की। ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि डेमोक्रेट्स की ओर से ऐसे प्रस्ताव लाए गए, जिनसे वह सहमत नहीं हैं, तो राष्ट्रपति के संवैधानिक वीटो अधिकार का इस्तेमाल किया जा सकता है।
हालांकि, ट्रंप ने यह भी कहा कि वह अगले दो वर्षों तक केवल विपक्ष के प्रस्तावों को वीटो करते हुए नहीं बिताना चाहते। उनके इस बयान को चुनावी नतीजों के बाद प्रशासन और विपक्ष के बीच संभावित राजनीतिक सहयोग की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, वीटो के इस्तेमाल की चेतावनी से आने वाले समय में अमेरिकी संसद और राष्ट्रपति के बीच टकराव की आशंका भी बनी हुई है।
दूसरी ओर, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने रिपब्लिकन पार्टी की चुनावी हार के लिए सीधे तौर पर ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति को जिम्मेदार ठहराया है। वेंस के मुताबिक, युद्ध, बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों ने मतदाताओं के रुख को प्रभावित किया।
इस घटनाक्रम ने अमेरिका की घरेलू राजनीति में विदेश नीति और आर्थिक दबाव के बीच गहरे संबंध को उजागर किया है। अब देखना होगा कि चुनावी झटके के बाद ट्रंप प्रशासन ईरान युद्ध और विपक्ष के साथ अपने संबंधों को लेकर क्या रणनीति अपनाता है।







