नयी दिल्ली: मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने केंद्र सरकार के उस फैसले की कड़ी आलोचना की है, जिसमें कल्याणकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए आधार के स्थान पर बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और मतदाता पहचान पत्र (ईपीआईसी) को अनिवार्य बनाने की घोषणा की गई है। पार्टी ने इस निर्णय को ग्रामीण गरीबों और वंचित तबकों के अधिकारों पर एक और हमला करार दिया है।
माकपा ने जारी बयान में कहा कि सरकार का यह कदम उन लोगों के लिए परेशानी बढ़ा सकता है, जो पहले से ही तकनीकी और दस्तावेजी समस्याओं के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। पार्टी के अनुसार, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण में होने वाली तकनीकी विफलताओं के कारण ग्रामीण रोजगार योजनाओं से जुड़े कई मजदूरों को उनके अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा है।
बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण को बताया बड़ी बाधा
पार्टी ने कहा कि उम्र बढ़ने के साथ बुजुर्ग महिलाओं की आंखों की पहचान करने में मशीनों को परेशानी होती है। इसी तरह, लंबे समय तक मजदूरी करने वाले श्रमिकों के अंगूठे के निशान घिस जाने के कारण बायोमेट्रिक मशीनें उनका प्रमाणीकरण नहीं कर पातीं। ऐसी स्थिति में पात्र लाभार्थियों को भी सरकारी सुविधाएं प्राप्त करने में दिक्कत होती है।
माकपा ने ई-केवाईसी की प्रक्रिया में स्मार्टफोन की अनिवार्यता पर भी सवाल उठाए। पार्टी का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में गरीब परिवारों के पास स्मार्टफोन और डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में तकनीकी शर्तों को अनिवार्य बनाना उनके लिए कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच को और मुश्किल बना सकता है।
एसआईआर प्रक्रिया पर भी उठाए सवाल
माकपा ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का मुद्दा उठाते हुए दावा किया कि इस प्रक्रिया के तहत 13.4 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। पार्टी के अनुसार, इससे गरीबों, महिलाओं, मुस्लिम समुदाय और अन्य वंचित वर्गों के लोग प्रभावित हुए हैं।
पार्टी ने केंद्र सरकार से बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और मतदाता पहचान पत्र की अनिवार्यता से जुड़े फैसले को तत्काल वापस लेने की मांग की है। साथ ही कहा है कि सभी पात्र नागरिकों को बिना अतिरिक्त दस्तावेजी और तकनीकी बाधाओं के सार्वभौमिक कल्याणकारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए।







