तिरहुत: बिहार की राजनीति में शिक्षक नेता वंशीधर बृजवासी ने एक बार फिर अपनी जीत से सबका ध्यान खींचा है। तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में दोबारा जीत दर्ज कर उन्होंने जेडीयू, आरजेडी और जन सुराज के प्रत्याशियों को पीछे छोड़ दिया। उनकी इस जीत को शिक्षकों और स्नातकों के बीच उनकी मजबूत पकड़ के रूप में देखा जा रहा है।
वंशीधर बृजवासी की पहचान केवल एक एमएलसी के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षकों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले नेता के तौर पर भी है। उनके राजनीतिक सफर की चर्चा उस समय तेज हुई, जब बिहार के शिक्षा विभाग के तत्कालीन अपर मुख्य सचिव केके पाठक के साथ उनका टकराव सुर्खियों में आया। शिक्षकों के मुद्दों को लेकर मुखर रहने वाले बृजवासी को विभागीय कार्रवाई का सामना करना पड़ा। उन्हें पहले निलंबित किया गया और बाद में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
बृजवासी का शिक्षक आंदोलन से जुड़ाव काफी पुराना है। उन्होंने शिक्षामित्र के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी। शिक्षकों की समस्याओं और उनके अधिकारों को लेकर आवाज उठाते हुए उन्होंने संगठन के माध्यम से अपनी पहचान बनाई। समय के साथ उनका आंदोलन व्यापक हुआ और शिक्षक समुदाय के बीच उनका जनाधार मजबूत होता गया।
नौकरी से बर्खास्तगी के बाद उन्होंने तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने का फैसला किया। वर्ष 2024 के उपचुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल कर उन्होंने राजनीतिक दलों को चौंका दिया था। अब 2026 के चुनाव में दोबारा जीत दर्ज करके उन्होंने अपनी राजनीतिक ताकत साबित की है।
विधान परिषद में बृजवासी शिक्षकों, स्नातकों और युवाओं की समस्याओं को उठाने का दावा करते रहे हैं। सीतामढ़ी में जानकी विश्वविद्यालय की स्थापना जैसे क्षेत्रीय मुद्दे भी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहे हैं।
वंशीधर बृजवासी की लगातार दूसरी जीत ने यह संदेश दिया है कि स्थानीय मुद्दों, संगठन और जनसमर्थन के दम पर निर्दलीय उम्मीदवार भी बड़े राजनीतिक दलों को चुनौती दे सकते हैं। अब सबकी नजर इस बात पर होगी कि वे विधान परिषद में शिक्षकों और स्नातकों की अपेक्षाओं को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।







