मुंबई: हिंदी सिनेमा के सदाबहार अभिनेता, निर्माता और निर्देशक देवानंद ने करीब छह दशक तक अपने अभिनय और खास अंदाज से दर्शकों के दिलों पर राज किया। हालांकि फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने का उनका सफर आसान नहीं था। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को पूरा करने के लिए लगातार संघर्ष किया और आगे चलकर हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय सितारों में शामिल हुए।
गुरदासपुर में जन्मे धर्मदेव पिशोरीमल आनंद ने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की शिक्षा पूरी की। आगे पढ़ाई की इच्छा थी, लेकिन आर्थिक स्थिति के कारण उन्हें नौकरी करने की सलाह दी गई। इसके बाद उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाने का फैसला किया और मुंबई पहुंच गए।
मुंबई में शुरुआती दिनों में उनके पास बेहद कम पैसे थे। जीवनयापन के लिए उन्होंने मिलिट्री सेंसर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी की। इसके बाद वह अपने बड़े भाई चेतन आनंद के साथ जुड़े और इप्टा के नाटकों में छोटे-छोटे किरदार निभाने लगे। वर्ष 1945 में फिल्म ‘हम एक हैं’ से उन्होंने अभिनय की शुरुआत की। वर्ष 1948 में आई ‘जिद्दी’ उनकी पहली बड़ी हिट साबित हुई।
इसके बाद देवानंद ने नवकेतन बैनर की स्थापना की और फिल्म निर्माण में कदम रखा। ‘बाजी’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘सीआईडी’, ‘काला पानी’, ‘गाइड’ और ‘ज्वेल थीफ’ जैसी फिल्मों ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। ‘गाइड’ में उनके अभिनय को खास तौर पर सराहा गया और उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला।
देवानंद ने वर्ष 1970 में ‘प्रेम पुजारी’ के साथ निर्देशन की शुरुआत की। इसके बाद ‘हरे रामा हरे कृष्णा’, ‘हीरा पन्ना’, ‘देश परदेस’ और ‘अव्वल नंबर’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया।
उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कारों के अलावा पद्म भूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। देवानंद का निधन 3 दिसंबर 2011 को हुआ, लेकिन उनका अभिनय, अंदाज और फिल्मों का योगदान आज भी हिंदी सिनेमा की विरासत का हिस्सा है।







