बेंगलुरु: कर्नाटक मंत्रिमंडल में दो पद खाली होने के बाद इन्हें भरने को लेकर कांग्रेस के भीतर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। बी. नागेंद्र के इस्तीफे के बाद पार्टी के सामने अब महिला प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय संतुलन और अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।
कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम में धन के कथित अवैध हस्तांतरण के विवाद के बीच बी. नागेंद्र ने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दिया था। उनके इस्तीफे से एक मंत्री पद खाली हुआ, जबकि एक अन्य पद पहले से रिक्त है। ऐसे में मंत्रिमंडल में फेरबदल की संभावनाओं को लेकर कांग्रेस में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
पार्टी के भीतर संभावित दावेदारों को लेकर अलग-अलग समीकरणों पर विचार किया जा रहा है। बल्लारी के प्रतिनिधित्व के लिहाज से अन्नपूर्णा तुकाराम का नाम चर्चा में है, हालांकि उनके संभावित मंत्री बनाए जाने को लेकर स्थानीय कांग्रेस नेताओं के बीच मतभेद की बात सामने आई है।
महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के विकल्प के तौर पर मंत्री लक्ष्मी हेब्बालकर के नाम पर भी विचार किए जाने की चर्चा है। वहीं, एक अन्य संभावित फॉर्मूले के तहत बसवराज शिवन्ना को मंत्रिमंडल में शामिल करने की संभावना पर भी मंथन चल रहा है।
इस बीच विधायक एम. कृष्णप्पा के मंत्रिमंडल विस्तार में जगह नहीं मिलने को लेकर नाराज होने की चर्चा है। दूसरी ओर, बी. नागेंद्र के इस्तीफे के बाद कांग्रेस के भीतर एसटी समुदाय से किसी नेता को मंत्री बनाए जाने की मांग भी तेज हो गई है। पार्टी के कुछ नेताओं का तर्क है कि खाली हुए पद को एसटी समुदाय के प्रतिनिधि से भरा जाना चाहिए।
मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल ऐसे समय में चर्चा में है जब भाजपा ने वाल्मीकि निगम मामले को लेकर पदयात्रा का ऐलान किया है। इससे यह मुद्दा एक बार फिर राज्य की राजनीति के केंद्र में आ गया है।
मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के सामने अब विपक्ष के हमले का जवाब देने के साथ-साथ पार्टी के भीतर जातीय, क्षेत्रीय और व्यक्तिगत दावों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। वर्ष 2028 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इन दो पदों पर होने वाली नियुक्तियों को कांग्रेस के आंतरिक राजनीतिक संतुलन के लिहाज से अहम माना जा रहा है।







