वॉशिंगटन: अमेरिका ने शनिवार को कई प्रवासियों को उनके मूल देशों के बजाय मध्य अफ्रीकी गणराज्य निर्वासित किया। निर्वासित लोगों में अफगानिस्तान के करीब 20 वर्षीय एक नागरिक के अलावा ईरान, नेपाल और निकारागुआ के नागरिक भी शामिल बताए जा रहे हैं। इस कार्रवाई को लेकर मानवाधिकार संगठनों और आव्रजन मामलों के वकीलों ने चिंता जताई है।
मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स फर्स्ट की शरणार्थी एवं आव्रजन अधिकार नीति निदेशक सावी आर्वे के अनुसार, शनिवार को मध्य अफ्रीकी गणराज्य की राजधानी बांगुई पहुंची उड़ान में 12 अफगान और आठ ईरानी नागरिकों के साथ नेपाल और निकारागुआ के कई नागरिक भी मौजूद थे।
तालिबान के खतरे के बावजूद अफगान नागरिक को किया निर्वासित
अफगान नागरिक के वकील अल्मा डेविड के मुताबिक, अमेरिकी अदालत ने उसे अफगानिस्तान भेजे जाने से सुरक्षा प्रदान की थी, क्योंकि वहां तालिबान द्वारा उत्पीड़न का खतरा था। अदालत में पेश दस्तावेजों के अनुसार, उसके परिवार को तालिबान की ओर से धमकियां मिली थीं।
वकील ने बताया कि उसके एक भाई ने अफगान राष्ट्रीय सेना में सेवा दी थी और अब अमेरिका में रहता है। वहीं, उसका दूसरा भाई अमेरिका में प्रशिक्षित पायलट था, जिसकी तालिबान ने हत्या कर दी थी। अफगान राष्ट्रीय सेना ने 2021 में तालिबान के सत्ता पर कब्जे से पहले अमेरिकी सेना के साथ मिलकर काम किया था।
तीसरे देशों में निर्वासन को लेकर विवाद
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि अमेरिकी प्रशासन ने कई लोगों को उनके मूल देश की बजाय तीसरे देशों में भेजने के लिए कई समझौते किए हैं। उनके अनुसार, हजारों लोगों को करीब दो दर्जन अन्य देशों में निर्वासित किया गया है।
आव्रजन मामलों के वकीलों का कहना है कि इस व्यवस्था के जरिए कुछ शरण चाहने वालों को अप्रत्यक्ष रूप से उन देशों में वापस भेजे जाने का खतरा है, जहां से वे पहले भागकर आए थे। उनका आरोप है कि ऐसी व्यवस्था कानूनी प्रक्रिया में मौजूद खामियों का इस्तेमाल कर सकती है।
जून के बाद दूसरी निर्वासन उड़ान
शनिवार की उड़ान जून के बाद मध्य अफ्रीकी गणराज्य के लिए दूसरी अमेरिकी निर्वासन उड़ान थी। जून में करीब 24 प्रवासियों को वहां भेजा गया था। इनमें एक ईरानी महिला भी शामिल थी, जिसे अपने देश लौटने पर उत्पीड़न का खतरा होने की बात कही गई थी।
मानवाधिकार संगठनों ने अमेरिका की निर्वासन नीति में पारदर्शिता और उन लोगों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए हैं, जिन्हें ऐसे तीसरे देशों में भेजा जा रहा है जहां उनकी कानूनी स्थिति और सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।







