
नयी दिल्ली: नक्सलवाद से मुक्त हो चुके क्षेत्रों में जमीन के नीचे दबाए गए विस्फोटक पदार्थ अभी भी सुरक्षा बलों के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं हैं। खासतौर पर छत्तीसगढ़ और झारखंड में अभी तक आईईडी का खतरा बरकरार है। केंद्रीय बलों के एक अधिकारी का कहना है कि माओवादी खत्म हो चुके हैं, मगर आईईडी बची हैं। पिछले दो वर्ष के दौरान नक्सलियों ने बड़े स्तर पर जमीन के नीचे बारूद लगाया था। वजह, वे सुरक्षा बलों के साथ आमने-सामने की लड़ाई करने में सक्षम नहीं थे, इसलिए नक्सलियों ने आवाजाही के कच्चे-पक्के रास्तों पर आईईडी दबा दी। अब वही आईईडी सुरक्षा बलों के अलावा ग्रामीणों और उनके पशुओं को चोट पहुंचा सकती हैं।
जब नक्सलवाद चरम पर था, तब आईईडी विस्फोट में लगाई गई बैटरी को बरसात से पहले निकाल लिया जाता था। अगर पांच छह माह तक आईईडी को ब्लास्ट नहीं किया जाता तो उस स्थिति में भी आईईडी की बैटरी बदलनी पड़ती थी। अप्रैल के बाद से अधिकांश इलाके शांत हैं। सुरक्षा बल नियमित गश्त कर रहे हैं। वे तकनीकी उपकरणों की मदद से आईईडी को जमीन से बाहर निकाल रहे हैं। आईईडी के ज्वाइंट पर बैटरी लगती है। प्रेशर आईईडी है तो उसमें भी बैटरी का इस्तेमाल होता है। कमांड आईईडी, जमीन से चार-पांच फुट नीचे लगती है। भले ही वहां तक पानी न पहुंचे, लेकिन नमी के चलते बैटरी काम करना छोड़ देती है। पेड़ों की जड़ों में भी बैटरी छिपाई जाती थी। नक्सलियों को जब मौका मिलता, वे तार बिछा कर विस्फोट कर देते थे।
वायर से संचालित आईईडी बरसात में काम करना छोड़ देती है। जहां पर भी वायर में ज्वाइंट होता है, वहां कार्बन जम जाता है। इससे बैटरी का पर्याप्त करंट आईईडी तक नहीं पहुंचता। ट्रिप वायर से संचालित आईईडी भी बरसात के पानी में खराब में हो जाती है। रिमोट कंट्रोल, इंफ्रारेड या मैग्नेटिक ट्रिगर्स, प्रेशर-सेंसिटिव बार्स या ट्रिप वायर, इनके उपकरण भी बरसात में ठीक तरह से काम नहीं करते। आईईडी के विद्युत उपकरणों को एक समय सीमा के बाद बदलना पड़ता है।
पांच छह वर्षों से नक्सलियों द्वारा आईईडी विस्फोट के लिए कंटेनर, केमिकल, डेटोनेटर, इनिशिएटर और हाईटेक वायर का इस्तेमाल किया जा रहा था। डेटोनेटर को पावर देने के लिए माओवादी, ड्राई बैटरी सेल का उपयोग कर रहे थे। बाद में उन्होंने स्पेशल डेटोनेटर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। नक्सलियों ने पोटाशियम, चारकोल, आर्गेनिक सल्फाइड, नाइट्रेट और ब्लैक पाउडर आदि से हजारों आईईडी और टिफिन बम तैयार किए थे। जिलेटिन स्टिक की मदद से आईईडी के अलावा, टिफिन बम और दूसरे तरह के प्रेशर बम तैयार किए गए।






