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सारंडा: झारखंड में नक्सली क्यों नहीं कर रहे सरेंडर? ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आईं 3 बड़ी वजहें

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सारंडा: झारखंड में नक्सली क्यों नहीं कर रहे सरेंडर? ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आईं 3 बड़ी वजहें

झारखंड के सारंडा क्षेत्र में चल रहे नक्सल मुक्ति अभियान के बावजूद नक्सलियों के सरेंडर की रफ्तार अपेक्षा के अनुसार नहीं बढ़ पाई है। इस मुद्दे की पड़ताल के लिए ग्राउंड रिपोर्ट में कई अहम कारण सामने आए हैं। पुलिस और खुफिया एजेंसियां लगातार प्रयास कर रही हैं, लेकिन अब तक अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है। जानकारी के अनुसार, झारखंड पुलिस ने हार्डकोर नक्सली मिसिर बेसरा और अन्य उग्रवादियों के परिजनों से संपर्क कर उन्हें सरेंडर के लिए तैयार करने की कोशिश की, लेकिन ये प्रयास कारगर साबित नहीं हुए। वहीं, पड़ोसी राज्यों छत्तीसगढ़ और ओडिशा में बड़ी संख्या में नक्सलियों के आत्मसमर्पण के विपरीत झारखंड में स्थिति अलग बनी हुई है। ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आई पहली बड़ी बाधा राज्य की सरेंडर नीति से जुड़ी है। पड़ोसी राज्यों में सरेंडर करने वाले नक्सलियों को जेल नहीं भेजा जाता, जबकि झारखंड में आत्मसमर्पण के बाद उन्हें पहले जेल या ओपन जेल में रखा जाता है। इसके अलावा अन्य राज्यों में नक्सलियों पर दर्ज मामलों को खत्म करने का प्रावधान भी है, जबकि झारखंड में ऐसा नहीं है। दूसरी वजह यह है कि पड़ोसी राज्यों में सरेंडर के बाद पुनर्वास के तहत नौकरी और अन्य सुविधाएं दी जाती हैं, जिससे नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटने की प्रेरणा मिलती है। झारखंड में यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत सीमित मानी जा रही है। तीसरी और सबसे अहम बाधा मिसिर बेसरा का खौफ है। जानकारों के अनुसार, वह प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) का शीर्ष नेता है और उसका प्रभाव इतना गहरा है कि निचले स्तर के नक्सली भी उसके खिलाफ जाकर सरेंडर करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक नेतृत्व स्तर पर बदलाव नहीं होता या सरेंडर नीति में व्यावहारिक सुधार नहीं किए जाते, तब तक सारंडा में बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण की संभावना कम ही रहेगी।

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