पटना: बिहार में राज्यसभा की पांचों सीट पर मिली जीत पर भाजपा के रणनीतिकार भले अपनी पीठ थपथपा रहे हो। लेकिन बीजेपी के रणनीतिकारों के हिस्से उनकी रणनीतिक हार का ऐसा दृश्य सामने आया जो उनसे उनके अकेले दम पर सरकार बनाने के सपने को चकनाचूर कर गया। अब जिस दम-खम और अपने अनुसार सरकार बनाने का जो सपना बीजेपी देख रही थी, उस पर भी कुठाराघात हो गया। चलिए समझते हैं क्या से क्या हो गया!
राज्य सभा चुनाव के बहाने बीजेपी पांचवी सीट के लिए समीकरण फिट कर अपनी ताकत बढ़ाना चाहती थी। इस समीकरण में छुपा था अपने दम पर सरकार बनाने का जुगाड़। राजद विधायक फैसल के आवास पर जब कांग्रेस के 4 और राजद के 2 विधायक जुटे तो बीजेपी के रणनीतिकारों ने मिशन 123 को सफल माना था। लेकिन ऐन मौक पर राजद और कांग्रेस के एक-एक विधायक के पाला बदल से इनकार के बाद बीजेपी का मनोबल टूट गया।
- विधायक बल की संख्या से अपरोक्ष रूप से बीजेपी यह बताना चाहती थी कि वह सरकार बनाने में समर्थ है।
- राज्य का मुख्यमंत्री बीजेपी अपने अनुसार बिठाना चाहती है। जदयू की तरफ से बार बार यह बयान आ रहा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इच्छा से ही मुख्यमंत्री बनेगा। दिल्ली से ही नीतीश कुमार बिहार को चलाएंगे। बीजेपी इस बंधन से मुक्त हो कर अपने उन कार्यकर्ताओं को उत्साहित करना चाहती थी, जो बिहार में भाजपा की अपनी सरकार बनाना चाहते हैं।
- नई सरकार में बीजेपी विभागों के प्रति भी अपना दावा मजबूत करना चाहती है। खास कर गृह और विधानसभा अध्यक्ष का पद नहीं देना चाहती है। वैसे तो बीजेपी की चाहत यह थी कि केवल सीएम और डिप्टी सीएम में बदलाव हो और बाकी विभागों को यथावत रहने दिया जाय







