
नयी दिल्ली: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम पर “पुनर्विचार” के सुझाव को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर आरोप लगाया कि वह देश के सबसे प्रभावी पारदर्शिता कानून को धीरे-धीरे कमजोर करने की कोशिश कर रही है। सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया में खरगे ने सवाल उठाया कि एमजीएनआरईजीए को कमजोर करने के बाद अब क्या आरटीआई की “हत्या” की तैयारी की जा रही है।
खरगे ने 2014 के बाद से आरटीआई व्यवस्था में आई गिरावट की ओर इशारा करते हुए कहा कि वर्ष 2025 तक 26 हजार से अधिक आरटीआई आवेदन लंबित पड़े हैं, जो व्यवस्था की बदहाल स्थिति को दर्शाता है। उन्होंने 2019 में किए गए संशोधनों का भी जिक्र किया, जिनके तहत केंद्र सरकार को सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन तय करने का अधिकार मिला। खरगे के मुताबिक, इससे आयोगों की स्वतंत्रता पर सीधा असर पड़ा है।
इसके अलावा, उन्होंने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 की आलोचना करते हुए कहा कि इस कानून ने आरटीआई के जनहित प्रावधानों को कमजोर किया है और सरकार को गोपनीयता की आड़ में जवाबदेही से बचने का अवसर दिया है। खरगे ने यह भी बताया कि दिसंबर 2025 तक केंद्रीय सूचना आयोग बिना मुख्य सूचना आयुक्त के काम कर रहा था, जो पिछले 11 वर्षों में सातवीं बार हुआ है।
कांग्रेस अध्यक्ष ने 2014 से अब तक 100 से अधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्याओं का हवाला देते हुए व्हिसलब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट, 2014 को लागू न किए जाने पर भी सरकार को घेरा। हालांकि, आर्थिक सर्वेक्षण में स्पष्ट किया गया है कि आरटीआई अधिनियम पर पुनर्विचार का सुझाव उसकी मूल भावना को कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि इसे वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप बनाने के उद्देश्य से दिया गया है। सर्वेक्षण में पारदर्शिता और निजता के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर देते हुए कहा गया है कि आरटीआई लोकतंत्र को मजबूत करने का एक साधन है, न कि अपने आप में अंतिम लक्ष्य।






