रांची: झारखंड की राजधानी रांची में दुर्गापूजा का इतिहास करीब 143 साल पुराना है। शहर के अल्बर्ट एक्का चौक के पास स्थित दुर्गाबाड़ी में सार्वजनिक दुर्गापूजा की शुरुआत वर्ष 1883 में हुई थी। महज एक रुपये 56 पैसे के खर्च और बंगाली समुदाय के करीब 200 लोगों की भागीदारी से शुरू हुई यह परंपरा आज रांची की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
गंगाचरण वेदांत बागीश ने की थी पहल
रांची में सार्वजनिक दुर्गापूजा की शुरुआत का श्रेय जिला स्कूल के शिक्षक गंगाचरण वेदांत बागीश को दिया जाता है। उस दौर में रांची एक छोटा कस्बा था और शहर का विस्तार मुख्य रूप से अपर बाजार तथा जिला स्कूल के आसपास तक सीमित था। गंगाचरण ने बंगाली समाज के लोगों के सामने कोलकाता की तर्ज पर सार्वजनिक दुर्गापूजा आयोजित करने का प्रस्ताव रखा।
उनके प्रयास से दुर्गापूजा समिति का गठन हुआ। इसके पहले अध्यक्ष देवेंद्र लाल बासु और सचिव नवाकृष्ण राय बने। देवेंद्र लाल बासु ने समिति के संचालन के लिए 51 रुपये का दान दिया था। शुरुआती पूजा फिरायालाल चौक के समीप एक खपरैल के मकान में आयोजित हुई, जिसे बाद में दुर्गाबाड़ी के नाम से पहचान मिली।
पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपरा
दुर्गाबाड़ी की खासियत यहां पूजा के पारंपरिक स्वरूप का आज भी कायम रहना है। मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के वादन तक की जिम्मेदारियां लंबे समय से पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई जा रही हैं।
शुरुआती दौर में प्रतिमा निर्माण का काम पश्चिम बंगाल के झालदा के कारीगर जगन्नाथ लहरी ने किया था। बाद में बीरभूम जिले के कारीगर देवेंद्र नाथ सूत्रधार और उनके वंशज भी इस परंपरा से जुड़े रहे। यहां ढाक बजाने वाले कलाकार भी पश्चिम बंगाल से आते हैं और पारंपरिक वादन की कला को आगे बढ़ाते हैं।
षष्ठी से शुरू होते हैं विशेष अनुष्ठान
दुर्गाबाड़ी में पूजा की विधि अन्य कई पूजा मंडपों से अलग है। यहां नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना के बजाय षष्ठी के दिन छह कलश स्थापित किए जाते हैं। इसके बाद पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान शुरू होते हैं। विजयादशमी पर महिलाओं के बीच सिंदूर खेला और श्रद्धालुओं द्वारा मां दुर्गा की प्रतिमा को कंधों पर उठाकर विसर्जन घाट तक ले जाना प्रमुख आकर्षण हैं।
समय के साथ रांची का विस्तार हुआ और दुर्गापूजा का स्वरूप भी व्यापक बना, लेकिन दुर्गाबाड़ी ने अपनी पुरानी परंपराओं को संजोकर रखा है। आज यह मंडप बंगाली संस्कृति, सामुदायिक एकता और मां दुर्गा के प्रति आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।







