सासाराम। त्योहारों के मौसम में बाजार और पूजा पंडालों की रौनक बढ़ जाती है। दुर्गा पूजा के दौरान जगह-जगह मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। श्रद्धालु इन प्रतिमाओं के दर्शन और पूजा-अर्चना करते हैं, लेकिन इन प्रतिमाओं को तैयार करने वाले मूर्तिकारों और कारीगरों की मेहनत अक्सर लोगों की नजरों से दूर रह जाती है।
मूर्तिकारों के अनुसार प्रतिमा तैयार करने का काम आसान नहीं है। एक प्रतिमा को आकार देने से लेकर उसे रंग-रूप देने और अंतिम रूप देने तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है। इसके लिए कारीगरों को सुबह से देर रात तक लगातार मेहनत करनी पड़ती है। कई जगहों पर पूरा परिवार इस काम में जुटा रहता है। महिलाएं और बच्चे भी अपनी क्षमता के अनुसार प्रतिमा निर्माण में सहयोग करते हैं।
कारीगरों का कहना है कि प्रतिमाओं को तैयार करने के लिए विशेष प्रकार की मिट्टी की जरूरत होती है। इसके अलावा रंग, सजावट और अन्य जरूरी सामग्री भी कई बार दूसरे शहरों से मंगानी पड़ती है। सामग्री की कीमत बढ़ने और मेहनत अधिक होने के बावजूद उन्हें अपनी मेहनत के अनुरूप पारिश्रमिक नहीं मिल पाता।
मूर्तिकारों का कहना है कि प्रतिमा तैयार करने में कई दिनों तक लगातार काम करने के बावजूद जब ग्राहक कीमत तय करते हैं तो अक्सर उनके श्रम और समय का पूरा मूल्य नहीं मिल पाता। उनका कहना है कि लोग प्रतिमा की भव्यता और सजावट पर ध्यान देते हैं, लेकिन उसे तैयार करने में लगे कारीगरों की मेहनत को समझने की कोशिश कम होती है।
कारीगरों ने सरकार से मूर्तिकारों और पारंपरिक कलाकारों के लिए विशेष कल्याणकारी योजनाएं शुरू करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि सरकार प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता, कच्चे माल और बाजार उपलब्ध कराने जैसी सुविधाएं दे तो इस पारंपरिक कला से जुड़े परिवारों को काफी राहत मिल सकती है।
मूर्तिकारों ने आम लोगों से भी अपील की है कि प्रतिमा खरीदते समय केवल कीमत पर बातचीत न करें, बल्कि उसे तैयार करने में लगे कारीगरों की मेहनत और समय को भी समझें। कलाकारों का कहना है कि उनकी कला को सम्मान और मेहनत के अनुरूप उचित मजदूरी मिलना जरूरी है।







