
नयी दिल्ली: केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री Jayant Chaudhary ने संसद में तीन-भाषा फॉर्मूले को लेकर चल रही बहस पर स्पष्ट रुख रखते हुए कहा कि National Education Policy (एनईपी 2020) किसी भी राज्य पर हिंदी या किसी अन्य भाषा को थोपने का प्रयास नहीं करती, बल्कि यह पूरी तरह से लचीला और बहुभाषावाद को प्रोत्साहित करने वाला ढांचा प्रदान करती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस नीति का उद्देश्य छात्रों की भाषाई क्षमता को बढ़ाना है, न कि किसी विशेष भाषा को अनिवार्य बनाना।
लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान पूरक सवालों का जवाब देते हुए चौधरी ने कहा कि एनईपी के तहत तीन-भाषा फॉर्मूला राज्यों के लिए बाध्यकारी नहीं है। इसमें राज्यों को यह स्वतंत्रता दी गई है कि वे अपनी जरूरतों और परिस्थितियों के अनुसार भाषाओं का चयन कर सकें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस नीति के अनुच्छेद 4.13 में बहुभाषावाद के लाभों को रेखांकित किया गया है, जिसमें कहा गया है कि शुरुआती स्तर पर कई भाषाओं का ज्ञान बच्चों की सीखने की क्षमता को बेहतर बनाता है।
तमिलनाडु द्वारा एनईपी 2020 पर जताई गई आपत्तियों का जिक्र करते हुए मंत्री ने कहा कि राज्य को केंद्र सरकार की ओर से समग्र शिक्षा योजना के तहत 538 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। हालांकि, आगे की धनराशि जारी करने के लिए राज्य सरकार को निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करते हुए उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) प्रस्तुत करना आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र और राज्य के बीच समन्वय से ही शिक्षा सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।
चौधरी ने यह भी बताया कि समग्र शिक्षा 2.0 के तहत भाषा शिक्षकों की नियुक्ति के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं, जिससे स्कूलों में बहुभाषी शिक्षा को मजबूती मिल सके। उन्होंने दोहराया कि एनईपी का क्रियान्वयन पूरी तरह से राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है और केंद्र केवल सहयोगी की भूमिका निभा रहा है।






