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कर्नाटक में कबूतरों को दाना डालने पर लगा प्रतिबंध, सरकार का बड़ा फैसला

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Feeding pigeons banned in Karnataka, a major government decision

बेंगलुरु: कर्नाटक स्वास्थ्य विभाग ने कबूतरों की बीट और पंखों से होने वाली सांस की बीमारियों तथा गंदगी के बढ़ते खतरों का हवाला देते हुए पूरे राज्य में सार्वजनिक और निजी स्थानों पर कबूतरों को दाना डालने पर प्रतिबंध लगा दिया है। विभाग ने एक अधिसूचना जारी कर ‘ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी’ सहित सभी नगर निगमों, अन्य शहरी और स्थानीय निकायों को इस प्रतिबंध को सख्ती से लागू करने तथा उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया है।


यह आदेश शहरी क्षेत्रों में कबूतरों की बढ़ती संख्या और उनकी बीट एवं पंखों के लगातार संपर्क में आने से सांस संबंधी बीमारियों के फैलने की आशंका को लेकर स्वास्थ्य अधिकारियों की बढ़ती चिंताओं के बाद आया है। कबूतरों को दाना डालने की अनुमति हालांकि केवल स्थानीय निकायों द्वारा स्थल निरीक्षण के बाद तय किए गए आधिकारिक स्थानों पर ही होगी। इन सुविधाओं का प्रबंधन गैर-सरकारी संगठनों या धर्मार्थ संस्थाओं द्वारा किया जाएगा, जो स्वच्छता, कचरा निपटान और रखरखाव के लिए जिम्मेदार होंगे। दाना डालने की अनुमति केवल सुबह 7 बजे से 9 बजे के बीच होगी।

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अधिसूचना में सड़कों, फुटपाथों, पार्कों, खुले सार्वजनिक स्थानों और अनधिकृत निजी परिसरों में कबूतरों को दाना डालने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।
अपार्टमेंट एसोसिएशनों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों को भी छतों, बालकनियों पर कबूतरों को दाना डालने से रोकने और पक्षियों के जमावड़े को हतोत्साहित करने के लिए नियमित सफाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।


हवाई उड्डयन सुरक्षा के खतरे को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने हवाई अड्डों के आसपास के इलाकों में कबूतरों को दाना डालने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
विभाग ने सभी स्थानीय निकायों को कबूतरों की बीट और पंखों से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों, विशेष रूप से घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में सांस की बीमारियों को बढ़ावा देने में उनकी भूमिका के बारे में जागरूकता अभियान चलाने का निर्देश दिया है।


अधिकारियों ने कहा कि इस कदम का उद्देश्य पक्षियों के प्रति दया भाव को कम करना नहीं है, बल्कि कबूतरों को दाना डालने की प्रक्रिया को वैज्ञानिक और स्वच्छ तरीके से नियंत्रित करना है ताकि नागरिक व पर्यावरणीय चिंताओं से निपटते हुए जनस्वास्थ्य की रक्षा की जा सके।