Home राष्ट्रीय महर्षि पाराशर की तपोभूमि के जीर्णोद्धार की मांग तेज, श्रद्धालुओं ने उठाई...

महर्षि पाराशर की तपोभूमि के जीर्णोद्धार की मांग तेज, श्रद्धालुओं ने उठाई आवाज

7
0
Demand for restoration of Maharishi Parashar's Tapobhoomi intensifies, devotees raise voice

जालौन: उत्तर प्रदेश में जालौन जिलेद की कालपी तहसील स्थित वेत्रवती (बेतवा) नदी के तट पर अवस्थित महर्षि पाराशर की तपोभूमि परासन के संरक्षण और जीर्णोद्धार की मांग एक बार फिर जोर पकड़ने लगी है। धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाने वाले इस प्राचीन स्थल की उपेक्षा पर स्थानीय ग्रामीणों ने चिंता व्यक्त करते हुए शासन और जनप्रतिनिधियों से इसके समग्र विकास की मांग की है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परासन और इसके आसपास का पंचकोसी क्षेत्र अत्यंत पवित्र माना जाता है। जनश्रुतियों में इस क्षेत्र को महर्षि मार्कण्डेय, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि च्यवन, महर्षि कर्दम, महर्षि वशिष्ठ तथा महर्षि पाराशर की तपस्थली बताया गया है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस पंचकोसी क्षेत्र की परिक्रमा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।


स्थानीय लोगों के अनुसार महर्षि पाराशर ने इसी स्थान पर यज्ञ, तप और वैदिक अनुष्ठान किए थे, जिसके कारण आगे चलकर इस स्थान का नाम ‘परासन’ पड़ा। इसी वजह से यह क्षेत्र ऋषि परंपरा और सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। गांव स्थित महर्षि पाराशर महाराज का प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। वर्तमान में मंदिर का निर्माण एवं जीर्णोद्धार ग्रामीणों के जनसहयोग से कराया जा रहा है। मंदिर से जुड़े प्रेम नारायण पुजारी, रज्जन सिंह, श्यामजी तिवारी, पाठक विनय कुमार, सुनील तिवारी और मनीष तिवारी सहित अन्य ग्रामीणों का कहना है कि अब तक किसी जनप्रतिनिधि अथवा सरकार की ओर से मंदिर के संरक्षण एवं विकास के लिए कोई आर्थिक सहायता या विशेष पहल नहीं की गई है।

GNSU Admission Open 2026


ग्रामीणों ने बताया कि पितृपक्ष के दौरान इस स्थल का विशेष धार्मिक महत्व रहता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पिंडदान एवं तर्पण करने आते हैं। इसके अलावा बेतवा नदी में मछलियों को आटे की गोलियां खिलाने की वर्षों पुरानी परंपरा आज भी निभाई जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इससे पितरों की तृप्ति होती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि परासन को ‘छोटा गया’ के नाम से भी जाना जाता है और इसका उल्लेख अनेक पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। इसी कारण उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु यहां दर्शन और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पहुंचते हैं।


ग्रामीणों का कहना है कि यदि सरकार इस तपोभूमि के संरक्षण और विकास की दिशा में गंभीर पहल करे तथा मंदिर, घाट, संपर्क मार्ग और श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाओं का विकास कराया जाए, तो परासन धार्मिक पर्यटन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है। इससे क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पहचान को नई पहचान मिलने के साथ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे।


ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से महर्षि पाराशर की इस प्राचीन तपोभूमि और मंदिर के संरक्षण तथा समुचित जीर्णोद्धार की मांग करते हुए कहा कि जालौन की यह अनमोल धार्मिक धरोहर केवल स्थानीय क्षेत्र ही नहीं, बल्कि समूचे बुंदेलखंड और भारतीय ऋषि परंपरा की अमूल्य विरासत है, जिसका संरक्षण समय की आवश्यकता है।