Home मनोरंजन अमजद खान: खलनायकी के वो बेताज बादशाह, जिनका किरदार आज भी यादगार

अमजद खान: खलनायकी के वो बेताज बादशाह, जिनका किरदार आज भी यादगार

26
0
Amjad Khan: The uncrowned king of villainy, whose character is still memorable

मुंबई: बॉलीवुड में अमजद खान का नाम ऐसे अभिनेता के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने अपनी दमदार अदाकारी और प्रभावशाली संवाद-अभिनय के दम पर खलनायकी को एक नया आयाम दिया। 12 नवंबर 1940 को जन्मे अमजद खान को अभिनय की कला विरासत में मिली थी। उनके पिता जयंत हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध खलनायक थे। अमजद खान ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म अब दिल्ली दूर नहीं से बाल कलाकार के रूप में की। वर्ष 1965 में वह अपनी होम प्रोडक्शन फिल्म पत्थर के सनम से बतौर अभिनेता शुरुआत करने वाले थे, लेकिन किसी कारणवश फिल्म का निर्माण नहीं हो सका। इसके बाद मुंबई से कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने फिल्म जगत में अपना करियर बनाने का फैसला किया।


वर्ष 1973 में फिल्म हिंदुस्तान की कसम से उन्होंने बतौर अभिनेता अपनी शुरुआत की, लेकिन उन्हें विशेष पहचान नहीं मिली। इसी दौरान थिएटर में उनके अभिनय से प्रभावित होकर पटकथा लेखक सलीम खान ने उन्हें शोले में गब्बर सिंह की भूमिका निभाने का प्रस्ताव दिया। शुरुआत में अमजद खान इस चुनौतीपूर्ण भूमिका को लेकर आशंकित थे, लेकिन बाद में उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया और चंबल के डाकुओं पर आधारित पुस्तक अभिशप्त चंबल का गहन अध्ययन किया।

GNSU Admission Open 2026


दिलचस्प बात यह है कि गब्बर सिंह की भूमिका के लिए पहले अभिनेता डैनी डेन्जोंगपा का चयन किया गया था, लेकिन धर्मात्मा की शूटिंग में व्यस्त होने के कारण उन्होंने यह भूमिका नहीं निभाई। इसके बाद सलीम खान की सिफारिश पर निर्देशक रमेश सिप्पी ने अमजद खान को यह अवसर दिया। वर्ष 1975 में शोले के प्रदर्शित होते ही गब्बर सिंह का किरदार दर्शकों के दिलो-दिमाग पर छा गया। उनकी आवाज, संवाद अदायगी और चाल-ढाल इतनी लोकप्रिय हुई कि लोग उनकी नकल करने लगे।


कहा जाता है कि शोले की शूटिंग के दौरान अमजद खान को मुंबई से बेंगलुरु पहुंचना था। जिस विमान से वह यात्रा कर रहे थे उसमें तकनीकी खराबी आ गई और अधिकांश यात्रियों ने आगे यात्रा करने से इनकार कर दिया, लेकिन शूटिंग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के कारण अमजद खान उसी विमान से यात्रा कर निर्धारित समय पर सेट पर पहुंचे। शोले की अभूतपूर्व सफलता ने अमजद खान को खलनायकी की दुनिया का बेताज बादशाह बना दिया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक यादगार भूमिकाएं निभाईं। वर्ष 1977 में सत्यजीत रे की चर्चित फिल्म शतरंज के खिलाड़ी में काम कर उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता का एक और आयाम प्रस्तुत किया।


अपने अभिनय में विविधता लाने के लिए अमजद खान ने चरित्र और हास्य भूमिकाएं भी निभाईं। वर्ष 1980 में प्रदर्शित फिरोज खान की सुपरहिट फिल्म कुर्बानी में उनके हास्य अभिनय को भी दर्शकों ने खूब सराहा। वर्ष 1981 में प्रकाश मेहरा की फिल्म लावारिस में उन्होंने अमिताभ बच्चन के पिता की भूमिका निभाकर अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया। इसी वर्ष फिल्म याराना में अमिताभ बच्चन के दोस्त की भूमिका में भी वह बेहद पसंद किए गए। फिल्म का गीत “बिशन चाचा कुछ गाओ” बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। याराना के लिए उन्हें अपने करियर का दूसरा फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार मिला।


इससे पहले वर्ष 1979 में फिल्म दादा के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वहीं वर्ष 1985 में फिल्म मां कसम के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। अमजद खान ने वर्ष 1983 में फिल्म चोर पुलिस के जरिए निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रखा, लेकिन फिल्म सफल नहीं हो सकी। वर्ष 1985 में उन्होंने अमीर आदमी गरीब आदमी का निर्देशन किया, किंतु यहां भी उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली।


वर्ष 1986 में एक गंभीर सड़क दुर्घटना के बाद उनका स्वास्थ्य लगातार प्रभावित रहा। इलाज के दौरान दवाओं के अधिक सेवन से उनका वजन बढ़ता गया और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ती रहीं। नब्बे के दशक में खराब स्वास्थ्य के कारण उन्होंने फिल्मों में काम करना काफी कम कर दिया। अपने करियर के अंतिम दौर में वह अमिताभ बच्चन को लेकर लंबाई चौड़ाई नामक फिल्म बनाना चाहते थे, लेकिन यह सपना अधूरा रह गया। करीब तीन दशकों तक अपनी शानदार अदाकारी से दर्शकों का मनोरंजन करने वाले अमजद खान 27 जुलाई 1992 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।