आज हम आपको लेकर चलेंगे इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों की ओर, जहां वीरता, साहस और बलिदान की अद्भुत कहानी लिखी गई थी। हम बात कर रहे हैं मेवाड़ के महान योद्धा महाराणा संग्राम सिंह प्रथम, जिन्हें दुनिया राणा सांगा के नाम से जानती है। राणा सांगा का जन्म 1482 ईस्वी में हुआ था। वे मेवाड़ के प्रतापी शासक राणा रायमल के पुत्र थे। बचपन से ही वे अदम्य साहस और नेतृत्व क्षमता के धनी थे। लेकिन सत्ता तक पहुंचने का मार्ग आसान नहीं था। अपने भाइयों के साथ सत्ता संघर्ष में विजयी होकर 1509 ईस्वी में वे मेवाड़ के महाराणा बने। राणा सांगा केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि कुशल रणनीतिकार भी थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में 18 बड़े युद्ध लड़े और अधिकतर में विजय प्राप्त की। उनका शरीर वीरता के चिह्नों से भरा था—80 से अधिक घाव, एक कटा हुआ हाथ, फूटी हुई एक आंख और निष्क्रिय एक पैर। लेकिन उनका हौसला कभी नहीं टूटा।
इब्राहिम लोदी से संघर्ष (1518-1520)
दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए राणा सांगा ने मालवा, गुजरात और अन्य राजपूत शासकों से गठबंधन किया। कई युद्धों में उन्होंने इब्राहिम लोदी को परास्त कर अपनी वीरता का लोहा मनवाया गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने मेवाड़ की शक्ति को कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन राणा सांगा ने उसे करारी शिकस्त दी। 17 मार्च 1527, यह तारीख इतिहास के पन्नों में अमर है। बाबर, जिसने पानीपत के युद्ध में इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली पर कब्जा किया, अब मेवाड़ की ओर बढ़ रहा था। राणा सांगा ने उसे विदेशी आक्रांता समझते हुए उसे भारत से खदेड़ने का निश्चय किया। खानवा के मैदान में राणा सांगा के नेतृत्व में राजपूत, अफगान और कई हिंदू राजा एकजुट हुए। लेकिन बाबर की युद्ध रणनीति, तोपखाने और उसकी सेना की आधुनिक तकनीक के आगे यह गठबंधन टिक नहीं पाया। बाबर ने अपनी सेना को ‘ग़ाज़ी’ घोषित कर युद्ध को धर्मयुद्ध बना दिया। अंततः, यह युद्ध राणा सांगा के लिए निर्णायक साबित हुआ।
खानवा की हार के बावजूद, राणा सांगा ने हार नहीं मानी। उन्होंने फिर से सेना संगठित करने का प्रयास किया, लेकिन दुर्भाग्यवश उनके ही सरदारों ने उन्हें विष देकर मार दिया क्योंकि वे एक और विनाशकारी युद्ध से बचना चाहते थे। राणा सांगा केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक अमर प्रेरणा हैं। उनकी गाथा हमें सिखाती है कि वीरता केवल युद्ध जीतने में नहीं, बल्कि अपने सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा में निहित होती है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस, धैर्य और त्याग की मिसाल बना रहेगा। तो यह थी मेवाड़ के महायोद्धा राणा सांगा की अमर गाथा। वे न सिर्फ इतिहास के पन्नों में अमर हैं, बल्कि हर भारतवासी के हृदय में वीरता की अलख जगाते हैं। ऐसी ही रोचक और प्रेरणादायक कहानियों के लिए बने रहिए जागृति टाइम्स के साथ। धन्यवाद!







