यूपी में गन्ना मूल्य बढ़ाने की मांग तेज, चुनाव से पहले किसानों को राहत की उम्मीद
Demand for higher sugarcane prices intensifies in UP; farmers hope for relief ahead of elections.

सहारनपुर: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही गन्ना किसानों के लिए राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) बढ़ाने की मांग तेज हो गई है। चालू पेराई सत्र 2026-27 में योगी आदित्यनाथ सरकार से गन्ने की कीमत में बढ़ोतरी की उम्मीद जताई जा रही है। प्रदेश में करीब 50 लाख गन्ना किसान हैं और लगभग 100 विधानसभा सीटों पर गन्ना तथा इससे जुड़ी अर्थव्यवस्था का सीधा प्रभाव माना जाता है। ऐसे में गन्ना मूल्य का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो गया है।

पिछले पेराई सत्र में राज्य सरकार ने गन्ने के मूल्य में 30 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की थी। इसके बाद अगैती प्रजाति के गन्ने का एसएपी 400 रुपये और सामान्य प्रजाति का मूल्य 380 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया था। उत्तर प्रदेश देश के प्रमुख गन्ना एवं चीनी उत्पादक राज्यों में शामिल है। यहां सरकार की ओर से गन्ने का परामर्श मूल्य तय किया जाता है। चुनावी वर्षों में गन्ना मूल्य बढ़ाने का फैसला किसानों को साधने की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी माना जाता रहा है।

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प्रदेश में पेराई सत्र शुरू हो चुका है, लेकिन सरकार ने अभी तक नए एसएपी की घोषणा नहीं की है। इस बीच समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि उनकी सरकार बनने पर गन्ना आपूर्ति के 24 घंटे के भीतर भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा।

सूत्रों के मुताबिक, मुख्य सचिव शशि प्रकाश गोयल चीनी मिल मालिकों और किसान प्रतिनिधियों के साथ इस मुद्दे पर बैठक कर चुके हैं। किसान संगठनों ने खेती की बढ़ती लागत का हवाला देते हुए गन्ने का मूल्य 450 से 500 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग रखी है। वहीं, चीनी मिल मालिक मूल्य में बढ़ोतरी नहीं किए जाने के पक्ष में तर्क दे रहे हैं।

गन्ना मूल्य में वृद्धि के पिछले रिकॉर्ड पर नजर डालें तो योगी सरकार ने अलग-अलग पेराई सत्रों में सीमित बढ़ोतरी की है। वहीं, मायावती के कार्यकाल में चार बार गन्ने के मूल्य में उल्लेखनीय इजाफा किया गया था। अखिलेश यादव के कार्यकाल में भी चुनाव से पहले एक बार 25 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई थी।

अब किसानों की निगाहें योगी सरकार के फैसले पर टिकी हैं। गन्ने की कीमत में होने वाली बढ़ोतरी का असर लाखों किसानों की आमदनी के साथ आगामी चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।