
तेल अवीव: इजराइल के संसदीय चुनाव को लेकर मध्य-पूर्व की राजनीति में हलचल तेज है। इस चुनाव का असर केवल इजराइल की नई सरकार तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि ईरान के साथ संबंधों, गाजा में जारी संघर्ष और क्षेत्रीय शांति की संभावनाओं पर भी पड़ सकता है। हालांकि, ईरान पर संभावित नए हमलों और चुनाव के बाद की सैन्य रणनीति को लेकर किए जा रहे दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
चुनावी मुकाबले में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उनके दक्षिणपंथी सहयोगियों के सामने विपक्षी गठबंधन की चुनौती है। पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट को विपक्षी राजनीति के प्रमुख चेहरों में गिना जाता है। चुनाव से पहले प्रकाशित सर्वेक्षणों में किसी भी खेमे को 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों का स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिखा। ऐसे में छोटे राजनीतिक दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है।
गठबंधन से तय होगी सरकार की तस्वीर
इजराइल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते, बल्कि राजनीतिक दलों को संसद के लिए वोट देते हैं। इसलिए सबसे अधिक सीटें जीतने वाला दल भी सरकार बनाने की स्थिति में तभी पहुंचता है, जब वह पर्याप्त सांसदों का समर्थन जुटा ले। चुनाव के बाद गठबंधन बनाने की प्रक्रिया सत्ता का भविष्य तय करने में अहम होगी।
नेतन्याहू की प्रमुख ताकत उनकी सुरक्षा संबंधी छवि रही है। वह लंबे समय से ईरान को इजराइल के लिए गंभीर खतरा बताते रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन भी उनके राजनीतिक रुख का महत्वपूर्ण पहलू है। हालांकि, विपक्ष ने सात अक्टूबर के हमले को रोकने में हुई सुरक्षा संबंधी विफलताओं को लेकर सरकार से जवाबदेही की मांग की है।
इसके अलावा, अति-रूढ़िवादी यहूदियों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने का विवाद और न्यायपालिका की शक्तियों में कटौती के प्रयास भी चुनावी बहस के महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं।
ईरान और गाजा पर पड़ सकता है असर
नेतन्याहू की सत्ता में वापसी से ईरान के खिलाफ कठोर नीति जारी रहने या और आक्रामक होने की आशंका जताई जा रही है। दूसरी ओर, विपक्षी सरकार अमेरिका और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ समन्वय तथा कूटनीतिक विकल्पों पर अधिक जोर दे सकती है। हालांकि, नेतृत्व में बदलाव से इजराइल की सुरक्षा नीति में तत्काल बुनियादी परिवर्तन होना तय नहीं है।
इस चुनाव का महत्व अमेरिका-इजराइल संबंधों, अरब देशों के साथ संभावित समझौतों और फिलिस्तीन के मुद्दे पर कूटनीतिक प्रयासों के लिहाज से भी है। यदि कोई भी गठबंधन बहुमत हासिल नहीं कर पाता, तो राजनीतिक गतिरोध या नए चुनाव की संभावना बन सकती है।
कुल मिलाकर, इजराइल के चुनावी नतीजे देश की आंतरिक राजनीति के साथ-साथ मध्य-पूर्व की सुरक्षा और स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण होंगे। नई सरकार के सामने ईरान के साथ तनाव, गाजा संघर्ष और क्षेत्रीय शांति के बीच संतुलन कायम करना बड़ी चुनौती रहेगी।






